इश्केमिक हार्ट डिज़ीज़ एवं स्ट्रोक भारत में कार्डियो-वैस्कुलर मौतों का मुख्य कारण : डॉ (प्रोफेसर) एन.एन. खन्ना

शब्दवाणी समाचार शुक्रवार 28 जून 2019 नई दिल्ली। 11वें एशिया पेसिफिक वैस्कुलर इंटरवेंशन कोर्स (एपीवीआईसी) के लिए मंच तैयार करते हुए, डॉ (प्रोफेसर) एन.एन. खन्ना, सीनियर कन्सलटेन्ट इंटरवेंशनल कार्डियोलोजी एवं वैस्कुलर इंटरवेंशन्स, इन्द्रप्रस्थ अपोलो हॉस्पिटल्स ने आज देश में कार्डियो-वैस्कुलर रोगों (सीवीडी/ कार्डियो-वैस्कुलर डिज़ीज़) पर रोशनी डाली। उन्होंने हाल ही हुए इनोवेशन्स के बारे में भी बताया जो रोग के बोझ को कम करने में मददगार साबित हो सकते हैं।



डॉ खन्ना ने बताया, “एपीवीआईसी के 11वें चैप्टर में दुनिया भर से प्रख्यात चिकित्सक हिस्सा लेंगे। इस साल देश में कार्डियो-वैस्कुलर रोगों के बढ़ते मामलों पर ध्यान केन्द्रित किया जाएगा। एक अनुमान के अनुसार भारत में होने वाली एक चौथाई मौतों का कारण कार्डियो-वैस्कुलर रोग ही हैं। वास्तव में भारत में 1,00,000 की आबादी पर 272 मौतें सीवीडी के कारण होती हैं, यह दर विश्वस्तरीय औसत 235 की तुलना में बहुत अधिक है। इश्कमिक हार्ट डिज़ीज़ और स्ट्रोक भारत में सीवीडी के कारण होने वाली 83 फीसदी मौतों का कारण हैं। ये रोग अमीर एवं गरीब दोनों वर्गों को प्रभावित करते हैं। युरोपीय समकक्षों की तुलना में कार्डियो-वैस्कुलर रोग भारतीयों को जीवन के सबसे उत्पादक वर्षों में प्रभावित करते हैं।


डॉ खन्ना ने पिछले कुछ दशकों के दौरान देश में आईएचडी के बढ़ने मामलों पर चिंता जताते हुए कहा, “शहरी भारत में 1960 में आईएचडी की दर 2 फीसदी थी, जो 2013 तक 7 गुना बढ़कर 14 फीसदी हो गईइसी तरह ग्रामीण क्षेत्रों में यह 1970 में 1.7 फीसदी थी, जो चार गुना बढ़कर 2013 में 7.4 फीसदी तक पहुंच गई। उन्होंने बताया कि दक्षिणी एशियाई आबादी में कम उम्र में मायोकार्डियल इन्फेक्शन (हार्ट अटैक) के भारतीय राज्यों में इश्कमिक हार्ट डिज़ीज़ की तुलना करें तो केरल, पंजाब, तमिलनाडू और महाराष्ट्र में यह दर सबसे ज्यादा पाई गई है।


पेरीफरल आर्टरी रोगों पर रोशनी डालते हुए डॉ खन्ना ने कहा, "एक अध्ययन के अनुसार हमने पाया कि दक्षिण भारत की शहरी आबादी में 20 साल से अधिक उम्र के लोगों में पीएडी की दर 32 फीसदी है। यह दर महिलाओं में अधिक है, हालांकि महिलाओं में इसके जोखिम कारक जैसे डायबिटीज़ और हाइपरटेंशन के मामले कम पाए गए हैं।


"2025 तक हाइपरटेंशन (उच्चरक्तचाप) के मामलों की संख्या दोगुनी होने का अनुमान है।” डॉ खन्ना ने कहा। भारतीय व्यस्कों में हाइपरटेंशन की अनुमानित दर 30 फीसदी है जिसमें से शहरी भारत में यह दर 34 फीसदी और ग्रामीण भारत में 28 फीसदी हैहाइपरटेंशन से पीड़ित मरीजों की संख्या में 2000 में 118 मिलियन से दोगुनी होकर 2025 में 213.5 मिलियन तक पहुंचने का अनुमान है। भारत में पिछले दो दशकों में औसत ब्लड प्रेशर बढ़ा है, हालांकि ज्यादातर पश्चिमी देशों में इसमें गिरावट दर्ज की गई है। साथ ही भारत के शहरी क्षेत्रों में डायबिटीज़ मेलिटस की दर पिछले 20 सालों में 9 फीसदी से दोगुना बढ़कर 17 फीसदी हो गई है, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में यह 2 फीसदी से चार गुना बढ़कर 9 फीसदी तक पहुंच गई है। एक अनुमान के अनुसार डायबिटीज़ मेलिटस से पीड़ित मरीजों की संख्या 2030 तक बढ़कर 101 मिलियन के चिंताजनक आंकड़े तक पहुंच जाएगी। डॉ खन्ना ने बताया।



 


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