कुसंग का परिणाम भयंकर होता है : स्वामी नारायणानंद महाराज

शब्दवाणी समाचार शनिवार 23 नवंबर 2019 (आशीष निगम) मौदहा,हमीरपुर। कस्बे के स्थानीय बड़ी देवी मंदिर परिसर में चल रहे नौ दिवसीय श्री रामकथा के दौरान शुक्रवार को छठे दिन अनंतश्री विभूषित काशीधर्मपीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी नारायणानंद तीर्थ महाराजश्री ने कहा, कुसंग का परिणाम कितना भयंकर होता है, कैकेयी मंथरा के बातों पर विस्वास कर लेती है।और वह प्रसन्न होकर के प्रसंशा करने लगती है। कैकेयी बहुत समझदार थी लेकिन मंथरा की बातों में आकर के एक अबोध बालिका की तरह कुमार्ग में चली गई। कुमार्ग का परिणाम कितना भयावह होता है यह अज्ञान में मालूम नहीं होता है इसलिये शास्त्र का श्रवण किया जाता है जिससे पहले से जानकारी हो जाय कि कुमार्ग का फल क्या होता है। किसी को तकलीफ देना, किसी को सताना किसी के वस्तु का हरण कर लेना यह सब कुमार्ग का ही परिणाम है।



उत्तम ग्रंथ तथा महापुरुषों के जीवनव्रत मनुष्य को जीवन निर्माण के लिए प्रेरणा देते हैं। मनुष्य आत्मनिरीक्षण, संकल्प एवं अभ्यास द्वारा सद्गुणों का विकास करके जीवन को उज्ज्वल बना सकता है। समय का सदुपयोग पुरुषार्थ, सत्यनिष्ठा तथा आहार-विहार में सावधानी तथा विवेक का आदर मनुष्य के विवेक को उदात्त बनाते हैं। वास्तव में, अंहकार का क्षीण होना अर्थात अंहकार का उदात्तीकरण अथवा दिव्यिकरण जीवन का परम पुरुषार्थ है।
पूज्य शंकराचार्य जी ने कहा मनुष्य विषयों का भोगों का चिंतन करता है और चिंतन करने से विषयों की कामना पैदा हो जाती है कामना में विघ्न पड़ने पर क्रोध आ जाता है क्रोध उत्पन्न होने पर व्यक्ति हिंसक हो जाता है। जिसका परिणाम विद्रोह है। कामना भोगों का चिंतन करने से उनमें आसक्ति हो जाती है और आसक्ति ही सारे झगड़े की जड़ है। ज्ञानी पुरुषों का जो व्यवहार होता है वह अनासक्त होकर कर्म करते हैं। तथा फल में समत्व की भावना रखते हैं। इसीलिए श्री राम वनवास होने पर आदर्श प्रस्तुत करते हैं। वह माता कैकेयी से कहते हैं महाराज की प्रतिज्ञा का पालन मैं अवश्य करूँगा महाराज ने यह सब मुझसे क्यों नहीं कहा उनकी आज्ञा होने पर मैं सब कुछ कर सकता हूँ। अविलंब वन में चला जाऊंगा। माता तुम्हारा तो मुझपर पूरा अधिकार है अगर ऐसी बात थी तो मुझसे कह सकती थी। पिता जी से कहकर उनको कितना कष्ट में डाल दिया इससे जान पड़ता है तुम मुझको पराया समझती हो। माता जो होना था हो गया अब ऐसा प्रयत्न करो भरत राज्य का पालन करें पिता का सेवा करें मैं तो वन जाने के लिए तैयार हूँ। राम के वचन सुनकर के दशरथ के दुःख की सीमा नहीं रही, कुछ नहीं बोल सके रोने लगे। पिता की ऐसी दशा देखी नहीं गयी कैकेयी की परिक्रमा किया माता पिता को प्रणाम किया और कौशिल्या के भवन में पहुंच गए। भगवान श्री राम समाज में आदर्श प्रस्तुत करते हैं कि पुत्र का कर्तव्य माता-पिता के साथ कैसा होना चाहिए।



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