बच्चियाँ क्यों नहीं सुरक्षित ? कमी कहाँ पर है ?

शब्दवाणी समाचार मंगलवार 10 दिसम्बर 2019 (परवेज़ अखतर गुड्डू) नई दिल्ली। आज news पेपर उठाते डर लगने लगा है खबर पढ़ते ही बेचैनी बढ जाती है महिलाओं बच्चियों पर हो रहे अपराध व ज़्यादती से रूह काँपने लगती है ,
ये बच्चियों व महिलाओं पर हो रहे अत्याचार व ज़्यादती का ही नतीज़ा है कि 
हैदराबाद में  पुलिस मुठभेड़ में  चार युवकों का जो इनकाउन्टर हुआ  इससे लगभग पूरे देश में लोगों ने *खुशी का इजहार* किया तमाम लोग जो ऐसे बलात्कारियों व अपराधियों के लिये अपने अपने अन्दाज़ में सख्त सज़ा की माँग कर रहे थे, 
 , संसद में भी कुछ सांसदों ने अपराधियों को भीड़ के हवाले करने या सरेआम फांसी पर लटका देने  की मांग की थी 



अक्सर क्रोध में सब लोग ऐसी बातें बोलते तो हैं
पर असली मुद्दा भूल जाते हैं की
 कमी है कहां  है
पर है हैदराबाद में उस युवती के साथ  बलात्कारियों ने जो किया और जो कुछ दिन पहले  उन्नाव में बलात्कार पीड़ित लड़की के साथ जमानत पर छूटे अभियुक्तों ने किया 
कानपुर में बलात्कार की पीड़ित किशोरी ने पुलिस की तरफ़ से कोई कार्यवाही नहीं होने व अपराधीयों की तरफ़ से धमकी मिलने पर खुद ही मौत को गले लगा लिया और खुदकुशी कर ली।
सच में यह घटनाएं लोगों की *आक्रोष* की सारी सीमा को तोड़ देती हैं 
हर बार यह मांग की जाती है कि ऐसा सख्त कानून बने और ऐसी सख्त सजा मिले कि फिर कोई किसी लड़की को  बुरी नजर से ना देखे ।
गुस्से में ये सब मांग करते हुए  हम भूल जाते हैं कि 
किसी भी तरह के सख्त कानून बनने से  सख्त सजा नहीं मिल जाती है 
इसके लिए घटना के तत्काल बाद  
पुलिस की चुस्ती 
हर कोण से पड़ताल 
और इमानदारी से 
सुबूत जुटाये जाने की जरूरत होती है 
कानून भी बिना सबूतों के अभियुक्तों को अपराध की सजा नहीं दे सकता है 
कमी कहां पर
बहुत गहनता से विचार करने की जरूरत है 
कई जगह पर पुलिस अपना काम कर लेती है तो *न्यायालय* के फैसले आने में इतना वक्त लग जाता है कि अपराधी कई दांव पेंच लगा कर बच निकलते हैं  
और कई मर्तबा  पुलिस के ऊपर इतना दबाव होता है और अपराधी इतना प्रभावशाली होता है के अपराधियों के समक्ष झुकना पड़ता है और भ्रष्टाचार के कारण जांच पड़ताल बिल्कुल ही लचर हो जाती है या तो रिपोर्ट ही नहीं दर्ज हो पाती है या फ़िर अपराधी  का मुकदमा इतना लंबित हो जाता है कि एक वक्त ऐसा आता है लोग तो उस अपराध को भूल ही जाते हैं और गवाह वगैरा भी मुकर जाते हैं, जिसका पूरा फ़ायदा अपराधी को मिलता है और वो बरी हो जाता है 
चाहे कृष्णानन्द की हत्या का मामला हो या फ़िर ऐसे ही बहुत सारे मामले जिसमें वक्त बीत जाने के बाद गवाह व सुबूत फ़ीके होने के कारण केस खत्म हो जाता है 
उन्नाव का ताजा कांड देख लीजिए पुलिस की भूमिका पर गौर कीजिए और सोचिये के क्या ये आक्रोष का विषय नहीं है ?
बलात्कारियों के खिलाफ लड़की की शिकायत पर पुलिस ने 3 महीने तक रिपोर्ट दर्ज नहीं की 
उन्नाव व रायबरेली की पुलिस से लड़की ने शिकायत की  
मगर किसी ने ध्यान नहीं दिया अदालत के हस्तक्षेप के बाद मुकदमा दर्ज हुआ और अभियुक्त गिरफ्तार हुए लेकिन उसमें भी इतनी हीला हवाली कि 3 ही माह में अभियुक्त जमानत पर रिहा हो गए और छूटने के बाद उस लड़की को जलाकर मार डाला 
कोई इतना बड़ा दुस्साहस कैसे कर सकता है ??
 यही सबसे बड़ा मुद्दा  है
पुलिस रिकार्ड के *मुताबिक अकेले* *उन्नाव* ज़िले में ही बीते 340 दिनों में 10 महिलायें हर दिन उत्पीड़न का शिकार हुईं प्रति दिन एक महिला की आबरू पर हमला हुआ लगभग 97 दुष्कर्म पीडित महिलायें आज भी न्याय पाने के लिये लड़ रही हैं, 
इसके बाद पूरे देश के बारे में तो आंकड़े लिखते हुये ही हाँथ कांप रहे हैं, 
अगर इन सब मामलों में पुलिस बिना किसी दबाव में आकर तत्काल रिपोर्ट लिखे निष्पक्ष जांच करें पीड़ित के साथ हमदर्दी रखे तो 
अपराधी बच नहीं सकते,
कुलदीप सेंगर वाला मामला हो चिन्मयानंद वाला मामला हो इन्ही जैसे तमाम रसूख दारों का मामला हो, हर बार यही साबित होता है 
पुलिस पीड़ित के पक्ष में खड़ी नहीं होती बलात्कार और हत्या जैसे मामलों में भी नहीं।
उसी का ही नतीजा है कि आज इस *इनकाउन्टर* को लोग ठीक कह रहे हैं, 
लखनऊ में कुछ साल पहले गोमती नगर में फुटपाथ पर झोपड़ी में रहने वाले एक मज़दूर की बच्ची के साथ बलात्कार करके उसको जानवर की तरह मार डाला गया था जिसकी खबर मीडिया में आने के बाद काफी हो-हल्ला हुआ था रोड जाम किए गए थे कैंडल मार्च निकाला गया था तमाम समाजसेवी संस्थाओं ने इस केस को संज्ञान में लिया था एक सिपाही से लेकर आला  अधिकारियों तक ने काफी फुर्ती दिखाई थी लग रहा था कि चंद लम्हों में चंद घंटों में या फिर चंद दिनों में अपराधी सलाखों के पीछे होगा पर ऐसा नहीं हुआ 
इसी तरह से तमाम बलात्कार के केस जो कि आज तक साल्व ही नहीं पाए जनता भी एक वक्त के बाद घटना को भूल जाती है मगर इन सब मामलों में हर पल हर घड़ी मरना उस पीड़ित बच्ची को किशोरी को यह महिला को पड़ता है जिनके साथ में यह दुष्कर्म होता है और उस मासूम के घर वालों को ज़िन्दगी भर तडपना होता है जो दरिन्दो के चंगुल में फ़ंस कर अपनी जान गंवा देती हैं, 
हमने जब से होश संभाला है यही सुनते आ रहे हैं और फिल्मों में भी देखते आ रहे हैं जिसमें बताया जाता है कानून से बचना बहुत मुश्किल है क्योंकि कानून के हाथ बहुत लंबे होते हैं 
बड़े बड़े खुलासे करने वाला कानून यहां पर बौना क्यों हो जाता है जहां पर उसके कद के साथ-साथ उसके लंबे हाथ भी छोटे हो जाते हैं ,
पुलिस की सख्ती इन बलात्कारियों पर नज़र क्यों नहीं आती है 
क्यों हर रोज समाचार पत्र में यही सब सुर्खियां रहती हैं 5 वर्षीय बच्ची के साथ रेप 8 वर्षीय बच्ची को बनाया हवस का शिकार, किशोरी से गैंगरेप, बलात्कार के विरोध में ज़िंदा जलाया पहचान छुपाने के लिये चेहरा कुचला  
आज बाहर या घरों में मां बहनें सुरक्षित नहीं है इस मामले में कमजोर कानून इस मामले पर अंकुश नहीं लगा पा रहा है समाज में इस बात का संदेश जा ही नहीं पा रहा है इस तरह की घिनौनी हरकत करने पर खौफनाक सजा भी मिल सकती है चंद मिनट की हवस की आग ठन्डी करने की कीमत जान दे कर भी चुकानी पड़ सकती है, 
जिस बलात्कारी के दिल में उस मासूम की तकलीफ का एहसास ना हो और उसके बाद उसकी जीवन लीला समाप्त करने में ना हिचकता हो ऐसे शक्स पर रहम दिली की क्या वजह है ?
चलती बस में गैंगरेप के मामले में साकेत फास्ट ट्रैक कोर्ट के न्यायाधीश महोदय योगेश जी जिन्होंने निर्भया कांड मामले में फांसी की सजा सुनाई इसी के साथ में 30 दिनों के अंदर हाई कोर्ट में अपील करने की इज़ाज़त भी दे दी अदालत के फैसले फैसले अक्सर अदालत में चक्कर लगाकर बदल जाते हैं गवाह मुकर जाते हैं पुलिस की तफ्तीश लूज हो जाती है इसके बाद फैसले बदल जाते हैं मान लिया यह फैसला नहीं बदलेगा तो भी सोचने वाली बात यह है कि आज भी उस कांड के इतने वर्ष बीत जाने के बाद भी अपराधी सरकारी मेहमान बने हुए हैं ऐसे ही ना जाने कितने केस हैं जो आज भी पेंडिंग है जिनके किए हुए अपराध लगभग जनता भूल चुकी है 
लेकिन तमाम अपराधों में यह बलात्कार वाला अपराध बिल्कुल अलग करके सोचें और बताएं के ऐसे शख्स के साथ कानून के पास हमदर्दी की क्या वजह है कहां पर उनके हाथ बंधे हैं आज गल्फ कंट्रीज में बलात्कार करने के मामले ना के बराबर है इसलिए कि वहां कानून बहुत सख्त हैं वहां पर बीच चौराहे पर पब्लिक के सामने फांसी दी जाती है,गोली मारी जाती है, पत्थर मार कर मौत की सजा दी जाती है, वहां पर लोग ख्वाब में भी बलात्कार या हत्या जैसे काम नहीं करते हैं, 
आज जैसा की हैदराबाद के मामले में हुआ बहुत लोगों की राय में सही हुआ,
और सही इसलिए भी हुआ 
2004 में *एक रेपिस्ट* को फ़ांसी दी गयी थी 
उसके बाद आज तक लगभग *चार लाख बलात्कार* का केस  पेन्डिन्ग हैं, 
कुछ हद तक ये लेट लतीफ़ी वाला सिस्टम भी आक्रोश करने वाला है, 
इस एनकाउंटर के बाद  शायद ही चंद लोग होंगे जो ये बोल रहे हैं कि इनकाउन्टर गलत हुआ
वरना तो ये लोगों का *आक्रोश* ही तो है के 
चार लोगों को मौत की नींद सुलाने वाली पुलिस को मिठाई खिलाई जा  रही हैं  पुलिस वालों पे फूल बरसाए जा रहे हैं  और मुबारकबाद दी जा रही है 
शायद यह सब  तुरंत फैसला ना होने  अपराधियों को बच निकलने और लगातार  महिलाओं व बच्चियों के प्रति  बढ़ते अपराध के कारण  लोग आक्रोशित होते जा रहे हैं  और एनकाउंटर जैसे मामले को  सही बोल रहे हैं 
एनकाउंटर ठीक हुआ है और सही मायनों में ऐसा होना भी चाहिए कि अगर क्लियर हो जाए और पता लग जाए यह शख्स अपराधी है तो बहुत ज्यादा कानूनी पचड़े में ना पड़ कर अदालत में समय व्यर्थ ना कर के उसको ऐसे ही सज़ा मिलनी चाहिए 
और अगर ऐसा होता है तो यकीनन ये एक नज़ीर बन जायेगी, 
और काफ़ी हद तक अपराधीयों में दहशतपूर्ण माहौल बनेगा, और तब अपने देश की बच्चियाँ व महिलायें सुकून की सांस ले पायेंगी 



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