भारत को 2070 तक नेट-जीरो लक्ष्य पाने के लिए 5600 गीगावाट सौर ऊर्जा क्षमता की जरूरत होगी: सीईईडब्ल्यू

◆ 2070 में ग्रीन हाइड्रोजन उद्योगों की कुल ऊर्जा में 19 प्रतिशत योगदान कर सकती है

◆ 2070 में नेट-जीरो लक्ष्य भारत पर जीडीपी के 4.1 प्रतिशत के बराबर का खर्च डाल सकता है

शब्दवाणी समाचार, बुधवार 13 अक्टूबर  2021, नई दिल्ली। भारत अगर 2070 तक ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को शून्य करने (नेट-जीरो) का लक्ष्य पाने के लिए प्रतिबद्ध है तो उसे अपनी कुल स्थापित सौर ऊर्जा क्षमता को बढ़ाकर 5630 गीगावाट करने की जरूरत होगी। यह बात काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर (सीईईडब्ल्यू) द्वारा आज जारी किए गए एक स्वतंत्र अध्ययन में कही गई है। इसके चलते, भारत में सौर ऊर्जा समेत ऊर्जा उत्पादन संबंधी संपत्तियों के लिए जमीन की कुल आवश्यकता लगभग 4.6 प्रतिशत होगी। भारत को सोलर फोटो वोल्टिक (पीवी) कचरे के निपटान के लिए भी अपेक्षित रिसाइकिलिंग क्षमता विकसित करने की जरूरत पड़ेगी। अभी भारत में अक्षय ऊर्जा की स्थापित क्षमता 100 गीगावाट है, जिसमें 40 गीगावाट सौर ऊर्जा शामिल है, और इसका लक्ष्य 2030 तक अक्षय ऊर्जा क्षमता को 450 गीगावाट तक बढ़ाना है।

सीईईडब्ल्यू के अपनी तरह के पहले अध्ययन ‘इंप्लीकेशंस ऑफ ए नेट-जीरो टारगेट फॉर इंडियाज सेक्टोरल एनर्जी ट्रांजिशंस एंड क्लाइमेट पॉलिसी’ में यह भी बताया है कि 2070 तक नेट-जीरो का लक्ष्य पाने के लिए विशेष रूप बिजली उत्पादन के लिए के लिए कोयले के उपयोग में 2040 तक कटौती की शुरुआत करने और 2040 से 2060 के बीच 99 प्रतिशत तक कमी लाने की जरूरत होगी। इसके अलावा, 2050 तक सभी क्षेत्रों में कच्चे तेल की खपत में कटौती की शुरुआत करने और 2050 से 2070 के बीच 90 प्रतिशत तक कमी लाने की आवश्यकता होगी। ग्रीन हाइड्रोजन औद्योगिक क्षेत्र की कुल ऊर्जा जरूरतों का 19 प्रतिशत पूरा कर सकता है। इन सारी बातों का मानना है कि इस बदलाव में हाइड्रोजन की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण, जबकि कार्बन कैप्चर एंड स्टोरेज (सीसीएस) तकनीक की भूमिका नगण्य होगी।

सीईईडब्ल्यू के अध्ययन में यह भी पाया गया कि भारत अगर 2070 तक शून्य उत्सर्जन (नेट-जीरो) लक्ष्य पाना चाहता है तो शून्य उत्सर्जन वर्ष (नेट-जीरो ईयर) में इस बदलाव की आर्थिक लागत सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का लगभग 4.1 प्रतिशत हो सकती है। यदि भारत इस समय-सीमा को घटाकर 2050 कर देता है तो इसकी आर्थिक लागत बहुत बढ़ जाएगी। यह लागत उस विशेष वर्ष में जीडीपी का लगभग 7 प्रतिशत हो सकती है। हालांकि, सीसीएस तकनीक में कोई बड़ी सफलता और कम लागत वाले वित्त की व्यवस्था इस बदलाव की आर्थिक लागत को घटाने में मदद कर सकती है।

सीईईडब्ल्यू के फेलो डॉ. वैभव चतुर्वेदी ने कहा, "भारत जैसे विशाल और विविधता वाले विकासशील देशों के लिए, उत्सर्जन में कटौती की शुरुआत (पीकिंग) करने के वर्ष और शून्य उत्सर्जन वर्ष के बीच कम से कम 30 वर्ष का अंतर रखना बहुत महत्वपूर्ण होगा। यह नीति निर्माताओं और अन्य हितधारकों को नई ऊर्जा व्यवस्था के लिए योजना बनाने और उसे अपनाने के लिए पर्याप्त समय देते हुए बाधारहित बदलाव को सुनिश्चित करेगा। इसके अलावा, जैसे हम शून्य उत्सर्जन वाले भविष्य की तरफ कदम बढ़ाएंगे, थोड़े समय के लिए ऊर्जा की कीमतें बढ़ सकती हैं और जीवाश्म-ईंधन की अर्थव्यवस्था से जुड़े लोगों को अपना रोजगार भी खोना पड़ सकता है। इसलिए, विकसित देशों को चाहिए कि वे विकासशील देशों को उदार वित्तीय और तकनीकी सहायता उपलब्ध कराएं, ताकि उन्हें न्यायसंगत बदलाव सुनिश्चित करते हुए उत्सर्जन को घटाने के महत्वाकांक्षी लक्ष्यों को निर्धारित करने में मदद मिल सके।

सीईईडब्ल्यू के सीईओ डॉ. अरुणाभा घोष ने कहा, “समानता (इक्विटी) निश्चित तौर पर नेट-जीरो बहस के केंद्र में होनी चाहिए। विकसित अर्थव्यवस्थाओं को नेट-जीरो का लक्ष्य घोषित करने के लिए 2050 तक का इंतजार नहीं करना चाहिए, बल्कि इसे पहले ही घोषित कर देना चाहिए। इससे विकासशील देशों को एक न्यायसंगत और सतत ऊर्जा परिवर्तन के लिए पर्याप्त अवसर मिल पाएगा। आगे बढ़ते हुए, नए रोजगार और बाजार सृजित करने के लिए भारत को अन्य देशों से साझेदारी करते हुए नई हरित प्रौद्योगियों में निवेश और विकास का हिस्सेदार बनना चाहिए। ग्रीन हाइड्रोजन एक ऐसी तकनीक है जो औद्योगिक क्षेत्र में कोयले की जगह ले सकती है। भारत को अनुसंधान और विकास में निवेश करना चाहिए, और आने वाले वर्षों में ग्रीन हाइड्रोजन और इलेक्ट्रोलाइजर्स के निर्यात का केंद्र बन जाना चाहिए। सीईईडब्ल्यू के अध्ययन के अनुसार, देश में 2070 में जितनी भी कारें बिकेंगी, उनमें इलेक्ट्रिक या बैटरी से चलने वाले यात्री वाहनों का हिस्सा 84 प्रतिशत हो जाएगा। इसके अलावा कुल ट्रकों में 79 प्रतिशत बैटरी-इलेक्ट्रिक तकनीक से, जबकि शेष हाइड्रोजन से चलेंगे। देश भर में सभी परिवारों को खाना पकाने के लिए मुख्य ईंधन के रूप में बिजली का उपयोग करना होगा। भारत के बिजली उत्पादन में पवन और परमाणु ऊर्जा की हिस्सेदारी को क्रमशः 1792 गीगावाट और 225 गीगावाट तक बढ़ाना होगा।

सीईईडब्ल्यू अध्ययन के निष्कर्ष बहुत उपयोगी हैं, क्योंकि इंटर-गवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (आईपीसीसी) की हालिया रिपोर्ट ने वैश्विक स्तर पर नेट-जीरो लक्ष्य के महत्व को रेखांकित किया है, ताकि आने वाले दशकों में कुल तापमान बढ़ोतरी को 1.5-2 डिग्री सेल्सियस तक सीमित किया जा सके। वैश्विक स्तर पर 125 से ज्यादा देशों ने नेट-जीरो भविष्य को पाने की इच्छा जताई है। भले ही भारत को अभी नेट-जीरो का लक्ष्य घोषित करना है, लेकिन यह पेरिस समझौते के तहत उत्सर्जन में कटौती की प्रतिबद्धताओं को पूरा करने वाला एकमात्र जी-20 देश है। यह अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन का प्रमुख भागीदार भी है और हाल ही में ग्रीन हाइड्रोजन में नए प्रयोगों, उत्पादन, भंडारण और उपयोगों को बढ़ावा देने के लिए राष्ट्रीय हाइड्रोजन मिशन की भी घोषणा की है।

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