अपोलो हॉस्पिटल्स ने स्ट्रोक पर जागरुकता बढ़ाने के लिए आयोजित किया सार्वजनिक जागरुकता प्रोग्राम

शब्दवाणी समाचार वीरवार 24 अक्टूबर 2019 नई दिल्ली।इण्डियन स्ट्रोक एसोसिएशन और इन्सटीट्यूट ऑफ न्यूरोसाइन्सेज़, अपोलो हॉस्पिटल्स ने लोगों को स्ट्रोक की पहचान, प्रबंधन एवं रोकथाम के बारे में शिक्षित करने के लिए एक 'सार्वजनिक जागरुकता प्रोग्राम' का आयोजन किया। प्रोग्राम का आयोजन, डॉ विनीत सूरी, सीनियर कन्सलटेन्ट, न्यूरोलोजी एवं को-ऑर्डिनेटर, न्यूरोलोजी विभाग, इन्द्रप्रस्थ अपोलो हॉस्पिटल्स और प्रेजीडेन्ट, इण्डियन स्ट्रोक एसोसिएशन द्वारा किया गया। बैठक में हिस्सा लेने वाले प्रख्यात दिग्गजों में शामिल थे, श्री एल के अडवाणी, भारत के पूर्व उप-प्रधानमंत्री; मिस शहनाज हुसैन, अग्रणी ब्यूटी चेन की संस्थापक; श्रीमती शर्मिला टैगोर, भारतीय फिल्म अभिनेत्री; श्री अशोक चौहान, संस्थापक, एमिटी युनिवर्सिटी; श्रीमती पिया सिंह, चेयरमैन, डीएलएफ; श्री विजय कपूर, दिल्ली के पूर्व लेफ्टिनेन्ट गवर्नर आदि। आमंत्रित लोगों में 200 से अधिक स्ट्रोक से उबर चुके मरीज़ और उनके परिवारजन भी शामिल थे, जिन्हें स्ट्रोक के प्रबंधन और रोकथाम के तरीकों पर जानकारी दी गई। इस अवसर पर एक सम्मान समारोह का आयोजन भी किया गया, जिसमें -- लोगों को सम्मानित किया गया।


डॉ सुरी ने बताया कि स्ट्रोक दुनिया भर में मृत्यु का दूसरा बड़ा कारण है, हर दो सैकण्ड में एक स्ट्रोक होता है और हर 6 सैकण्ड में स्ट्रोक के कारण एक जान चली जाती है। दुनिया में 4 में से एक व्यक्ति को अपने जीवन में स्ट्रोक होता है। इतने भयावह आंकड़ों के बावजूद इसके बारे में जागरुकता की कमी है। स्ट्रोक को न्यूमोनिक BEFAST (B- Sudden Balance loss यानि अचानक शरीर का संतुलन खोना; E- Sudden loss of vision in 1 or both Eyes यानि एक या दोनों आंखों से अचानक देखने में परेशानी , F- Face droop यानि चेहरे में बदलाव, A- Arm drift बाजू का सुन्न होना और S- Surred or difficult Speech यानि बोलने में परेशानी) द्वारा पहचाना जा सकता है।



परेशानी) द्वारा पहचाना जा सकता है। अगर मरीज़ को पहले कुछ घण्टों के अंदर सही इलाज मिल जाए तो इसका इलाज संभव है या इसके प्रभाव को कम किया जा सकता है। इन घण्टों को गोल्डन आवर्स कहा जाता है। इलाज के लिए मरीज़ को इन्ट्रावीनस इन्जेक्शन दिया जाता है जिससे 4.5 घण्टे के अंदर क्लॉट घुल जाता है। इसी तरह दिमाग में मौजूद क्लॉट को निकालने के लिए 6 घण्टे (कुछ मरीजों में 24 घण्टे) के अंदर एंजियोग्राफी द्वारा मैकेनिकल थ्रोम्बेक्टोमी की जाती है।


स्ट्रोक सिर्फ बुजुर्गों को होने वाली बीमारी नहीं, 10-15 फीसदी स्ट्रोक के मामले युवाओं में होते हैं। जीवनशैली से जुड़ी आदतें जैसे धूम्रपान, नशीली दवाओं का सेवन युवाओं में इसका मुख्य कारण है। Apollo HOSPITALS TOUCHING LIVES स्ट्रोक के 80 फीसदी मामलों को सरल उपायों द्वारा रोका जा सकता है जैसे ब्लड प्रेशर पर नियन्त्रण, उच्च रक्तचाप और मोटापे पर नियन्त्रण, जीवनशैली में बदलाव जैसे नियमित व्यायाम, वजन कम करना, धूम्रपान न करना, तंबाकू न चबाना और मध्यम मात्रा में शराब का सेवन।



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