भारत में सड़क दुर्घटनाओं के कारण परिवार गरीबी और कर्ज के बोझ तले दब जाता

शब्दवाणी समाचार, रविवार 14 फरवरी  2021, नई दिल्ली। भारत के 75 फीसदी से अधिक गरीब परिवारों की आय में सड़क दुर्घटनाओं के परिणामस्वरूप गिरावट आई है। इस तरह की सड़क दुर्घटनाओं के कारण गरीब परिवार को सात महीने से भी अधिक आय का नुकसान उठाना पड़ता है, वहीं यह नुकसान अमीर परिवार की एक महीने की आय से भी कम होता है। विश्व बैंक की नई रिपोर्ट में यह तथ्य सामने आया है। रिपोर्ट “Traffic Crash Injuries and Disabilities: The Burden on Indian Society” में गरीब परिवारों पर सड़क दुर्घटनाओं के गैर-अनुपातिक प्रभावों पर रोशनी डाली गई है, जो उन्हें गरीबी और कर्ज के दुष्चक्र में धकेल देती है। यह रिपोर्ट सड़क दुर्घटना, गरीबी, असमानता और सड़क के संवेदनशील उपयोगकर्ताओं के बीच संबंध पर रोशनी डालती है।

सड़क सुरक्षा पर आधारित यह अध्यन एक राष्ट्रीय गैर-सरकारी संगठन-सेव लाइफ फाउन्डेशन के सहयोग से किया गया। सर्वेक्षण के तहत चार भारतीय राज्यों- उत्तर प्रदेश, बिहार, तमिलनाडु और महाराष्ट्र से आंकड़े जुटाए गए। यह अध्यन गरीब एवं वंचित परिवारों पर सड़क दुर्घटनाओं के कारण पड़ने वाले सामाजिक, आर्थिक, लैंगिक एवं मनोवैज्ञानिक प्रभावों का मूल्यांकन करता है। रिपोर्ट दुर्घटना के शिकार व्यक्ति का जीवन बचाने और उसकी क्षमता में सुधार लाने के लिए नीति-उन्मुख दृष्टिकोण की अनुशंसा देती है, ताकि व्यक्ति का परिवार फिर से अपने पैरों पर खड़ा हो सके, उसे तुरंत आर्थिक, चिकित्सकीय एवं कानूनी सहायता मिले।

“हमने भारत में सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली मौतों को कम करने के लिए कई सकारात्मक प्रयास किए हैं। समाज के सभी हितधारकों के सहयोग से हम 2025 तक सड़क दुर्घटना के कारण होने वाली मौतों में 50 फीसदी कमी लाने के लिए प्रतिबद्ध हैं।” रिपोर्ट के अनावरण के अवसर पर सड़क परिवहन एवं राजमार्ग तथा सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम मंत्री श्री नितिन गडकरी ने कहा। ‘‘यह रिपोर्ट सड़क दुर्घटना के प्रभाव और गरीबी के बीच के संबंध पर रोशनी डालती है। मैं सभी राज्य सरकारों से आग्रह करता हूं कि तत्काल प्रभाव के साथ मोटर वाहन (संशोधन) अधिनियम, 2019 लागू करें तथा समाज के गरीब एवं वंचित वर्ग पर सड़क दुर्घटनाओं के प्रभावों को कम करने के लिए एक साथ मिलकर काम करें।” उन्होंने कहा।

रिपोर्ट इस दृष्टि से गांवों और शहरों के बीच के अंतर तथा महिलाओं पर गैर-अनुपातिक प्रभाव को बताती है। सर्वेक्षण के मुताबिक कम आय वाले ग्रामीण परिवार पर सड़क दुर्घटना का सबसे अधिक प्रभाव (56 फीसदी) पड़ता है, वहीं कम आय वाले शहरी गरीब परिवार पर 29.5 फीसदी और उच्च आय वाले ग्रामीण परिवार पर 39.5 फीसदी प्रभाव पड़ता है। परिवार गरीब हो या अमीर, परिवार में किसी भी व्यक्ति के साथ दुर्घटना के मामले में महिलाओं पर बोझ बढ़ जाता है, ऐसे मामलों में उन्हें ज़्यादा काम करना पड़ता है, उनकी ज़िम्मेदारियां बढ़ जाती है, दुर्घटना से पीड़ित व्यक्ति की देखभाल का ज़िम्मा उन पर ही आ जाता है। दुर्घटना के बाद तकरीबन 50 फीसदी महिलाओं पर पारिवारिक आय कम होने का बुरा असर पड़ता है। वहीं 40 फीसदी महिलाओं का काम करने का तरीका बदल जाता है, 11 फीसदी महिलाओं को आर्थिक संकट से निपटने के लिए ज़्यादा काम करना पड़ता है।

अध्यन में बीमा कवरेज की उपलब्धता की कम दरों पर भी रोशनी डाली गई है, इसके अलावा कानूनी मुआवजे के मामले में जागरुकता की कमी को भी बताया गया है। सर्वेक्षण के दो-तिहाई ट्रक चालक थर्ड पार्टी बीमा के बारे में जागरुक नहीं थे। किसी भी ड्राइवर ने अस्पताल में कैशलैस उपचार के लिए आवेदन नहीं किया था, न ही दुर्घटना के मामले में सोलेटियम फंड या एक्स-ग्रेटिया योजना के फायदों के लिए आवेदन किया था।

“सड़क दुर्घटना का गरीब परिवार पर विनाशकारी प्रभाव पड़ता है, पहले से गरीब परिवार और अधिक गरीबी में चक्र में फंस जाता है।” हार्टविग शाफर, दक्षिणी एशिया क्षेत्र के लिए विश्व बैंक के उपाध्यक्ष ने कहा। ‘‘विश्व बैंक गरीब परिवारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए भारत सरकार को सहयोग प्रदान करने के लिए प्रतिबद्ध है, ताकि इस तरह की दुर्घटना के मामले में परिवार पर आर्थिक बोझ को कम किया जा सके और उन्हें अचानक आई आपातकालीन स्थिति से निपटने में मदद की जा सके।” उन्होंने कहा।

आर्थिक बोझ के अलावा, रिपोर्ट सड़क दुर्घटना के सामाजिक प्रभाव को भी बताती है। कम आय वाले 64 फीसदी परिवारों ने बताया कि दुर्घटना के चलते उनके जीवनस्तर में गिरावट आई है (उच्च आय वर्ग वाले परिवारों की तुलना में दोगुना), वहीं 50 फीसदी से अधिक परिवारों ने दुर्घटना के बाद मानसिक तनाव की बात कही।

“रिपोर्ट के परिणाम उन क्षेत्रों पर भी रोशनी डालते हैं, जहां तुरंत सुधार की आवश्यकता है जैसे दुर्घटना के बाद आपातकालीन देखभाल और प्रोटोकॉल तथा बीमा एवं मुआवजे की प्रणाली। रिपोर्ट विकास एजेन्सियों, नीति निर्माताओं एवं राज्य सरकारों को मौजूदा प्रणाली में नीतिगत बदलाव लाने के लिए प्रोत्साहित करती है तथा सड़क सुरक्षा की स्थिति में सुधार लाने के लिए समाधान उन्मुख एवं समावेशी उपायों पर ज़ोर देती है।” पीयूष तिवारी, सीईओ एवं संस्थापक, सेव लाईफ फाउन्डेशन ने कहा।

रिपोर्ट स्वास्थ्य संबंधी बुनियादी ढांचे और कवरेज को अधिक सुलभ एवं समावेशी बनाने की अनुशंसा देती है; कम आय वाले दुर्घटनाग्रस्त परिवारों के लिए सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करने पर ज़ोर देती है; सड़क दुर्घटना के शिकार के लिए बीमा एवं मुआवजे के कानूनी ढांचे को सुलभ बनाने की बात कहती है; महिलाओं के लिए विशेष योजनाओं एवं प्रशासन की भागीदारी के माध्यम से सड़क दुर्घटना के लैंगिक प्रभावों को हल करने पर ज़ोर देती है; राज्यों के सहयोग से दुर्घटना पीड़ित बच्चों एंव युवा व्यस्कों के सशक्तीकरण पर ज़ोर देती है।

अध्यन के तहत तकरीबन 2500 लोगों पर सर्वेक्षण किया गया, जिनमें चार चुने गए राज्यों (उत्तप्रदेश और बिहार जो कम क्षमता वाले राज्यों का प्रतिनिधित्व करते हैं तथा तमिलनाडु और महाराष्ट्र जो उच्च क्षमता वाले राज्यों का प्रतिनिधित्व करते हैं) के शहरी एवं ग्रामीण क्षेत्रों से 1647 उत्तरदाता कम आय वाले परिवारों से, 432 उत्तरदाता उच्च आय वाले परिवारों से तथा 420 ट्रक चालक शामिल थे। अध्यन के गुणात्मक भाग में सड़क दुर्घटना का सामना कर चुके परिवारों के साथ बातचीत की गई है तथा 14-18 वर्ष के किशोर वर्ग के साथ साक्षात्कार किया गया है।

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