वार्टसिला और एलयूटी यूनिवर्सिटी बिजली उत्पादन की लचीली तकनीकों में निवेश पर जोर दिया

◆ 2050 के 100 फीसदी नवीकरणीय ऊर्जा लक्ष्य के लिए कुल LCOE का औसत करीब 3120 रुपये/MWh (39 €/MWh) है, जो 2020 में 6000 रुपये/Mwh (75 €/MWh) LCOE  था 

◆ वर्ष 2020 की कुल स्थापित क्षमता करीब 400 GW थी, जिसके 2050 तक 4,000 GW होने की उम्मीद है, जो अगले तीन दशकों में 10 गुणा बढ़ोतरी दर्शाता है

◆ वर्ष 2020 में बिजली उत्पादन में कोयले की हिस्सेदारी घटकर 68 फीसदी हो गई जो 2050 में शून्य फीसदी होगी क्योंकि बिजली उत्पादन के मामले में किफायती लागत वाले अक्षय ऊर्जा के स्रोत अब मुख्य स्रोत के तौर पर उभरकर सामने आए हैं

◆ 2050 में बिजली उत्पादन में गैस इंजन (आइसीई) की हिस्सेदारी 1.1 फीसदी होगी। यह पीक सप्‍लाई और बैलेंसिंग मुहैया कराने की प्रमुख भूमिका के साथ कम लागत और अधिक दक्षता से संचालित होगी

◆ स्थापित बिजली भंडारण क्षमता 2030 के करीब 22 TWh से बढ़कर 2050 में करीब 95 TWh होगी। 2050 में कुल बिजली मांग के 35 फीसदी की पूर्ति स्टोरेज आउटपुट से होगी और इसमें 99 फीसदी हिस्सेदारी अकेले बैटरी की होगी

◆ भारत में बिजली प्रणाली में होने वाला ट्रांजिशन बताता है कि भारत में ग्रीन हाउस उत्सर्जन को 2020 के 1,166 MtCO2eq से कम कर 2050 में शून्य किया जा सकता है और भारत इस तरह से जलवायु परिवर्तन को रोकने की दिशा में अपने लक्ष्यों को हासिल कर सकता है

2020 से 2050 के बीच बिजली संप्रेषण क्षमता में छह गुणा का इजाफा होगा। 2050 में कुल बिजली उत्पादन में राज्यों के बीच होने वाले बिजली संप्रेषण की हिस्सेदारी करीब 12 फीसदी होगी, जो संप्रेषण और वितरण ग्रिड के विकास की अहम भूमिका को दर्शाता है

शब्दवाणी समाचार, शुक्रवार 12 मार्च  2021मुंबई। टेक्नोलॉजी ग्रुप वार्टसिला और फिनलैंड की लैपीनरान्‍टा-लाठी यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्‍नोलॉजी (एलयूटी) ने भारत में 2050 तक कार्बन न्यूट्रल पावर सिस्टम की संभावनाओं का पता लगाने के लिए हाल ही में एक अनूठी पावर सिस्‍टम स्‍टडी की है। फिलहाल भारत ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के जिस रास्ते चल रहा है, उसमें कई आयाम शामिल हैं - संवहनीयता, देश भर में  ऊर्जा तक पहुंच और ऊर्जा में आत्मनिर्भरता को बनाए रखने के साथ सबसे जरूरी तेज आर्थिक विकास की दर को आगे बढ़ाना और उसे बनाए रखना है। एलयूटी यूनिवर्सिटी और वार्टसिला के संयुक्त अध्ययन ने वर्ष 2050 तक भारत में कम लागत और कार्बन न्यूट्रल बिजली प्रणाली की अहमियत पर बल दिया है। अध्ययन में बेहतरीन नीतिगत परिदृश्य में बिजली प्रणाली के विकास का आकलन किया गया है, जिसमें इस क्षेत्र में संवहनीय ऊर्जा और लचीली तकनीकों की मदद से ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को वर्ष 2050 तक शून्य करने का जिक्र है।

अध्ययन पर अपनी बात रखते हुए वार्टसिला एनर्जी के निदेशक (ग्रोथ एंड डिवलपमेंट, मध्य पूर्व और एशिया) पीटर होक्कलिंग ने कहा, ‘वार्टसिला में काम करने वाले पावर सिस्टम मॉडलिंग एक्सपर्ट्स की टीम ने लगातार लंबी अवधि की दिशा में होने वाले एनर्जी ट्रांजिशन के पर्यावरणीय और आर्थिक प्रभावों का अध्ययन करने की दिशा में काम किया है। साथ ही उन्होंने दुनिया भर में नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों की अधिक हिस्सेदारी वाले बिजली प्रणाली की आवश्यकता का अध्ययन किया है। यह अध्ययन 100 फीसदी नवीकरणीय या अक्षय ऊर्जा स्रोत वाले बिजली प्रणाली को बनाए जाने के लक्ष्य से संबंधित है जो बिजली प्रणाली में आइसीई (आंतरिक दहन इंजन) और भंडारण प्रौद्योगिकियों (बैटरी और सिंथेटिक गैस) को एकीकृत कर पंप स्टोरेज हाइड्रो प्लांट्स के बाद की स्थिति को समझने पर केंद्रित है। अध्ययन बताता है कि अक्षय ऊर्जा के स्रोतों वाले मिश्रित बिजली प्रणाली की तरफ दिशा में पूरी तरह से स्थानांतरित होने की स्थिति में भारत को आर्थिक और पर्यावरणीय तौर पर फायदा मिलेगा, जिसमें लचीली तकनीक और प्रौद्योगिकी से प्रणाली की विश्वसनीयता बढ़ेगी।

एलयूटी यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर (सोलर एनर्जी) डॉ. क्रिश्चियन ब्रेयर ने वार्टसिला के साथ सहयोग के बारे में कहा हमें वार्टसिला के साथ साझेदारी और इस रणनीतिक भागीदारी में हमारी तरफ से विशेषज्ञता का योगदान दिए जाने को लेकर गर्व है। यह अनुसंधान भारत में वर्ष 2025 तक आर्थिक रूप से व्यावहारिक कार्बन तटस्थ बिजली प्रणाली का मार्ग प्रशस्त करता है। अध्ययन के निष्कर्षों ने स्पष्ट रूप से वार्टसिला के 100% नवीकरणीय ऊर्जा भविष्य के लक्ष्य को प्रतिध्वनित किया है। वार्टसिला के साथ हमारे काम को संयोजित कर, यह शोध निश्चित रूप से आंखें खोलने वाला है। यह अध्ययन अक्षय ऊर्जा क्षमताओं और लचीली तकनीकों जैसे सिस्‍टम की विश्‍वसनीयता बनाए रखने के लिए स्टोरेज और आईसीई में तत्काल और लगातार अतिरिक्त निवेश पर बल देता है। इसके अतिरिक्त यह अध्ययन क्षेत्रीय और अंतरराज्यीय ग्रिडों को मजबूत करने के महत्व को भी रेखांकित करता है। साफ शब्दों में कहा जाए तो 2050 तक कार्बन न्यूट्रल की स्थिति हासिल करने के लिए जमीन पर काफी कुछ किए जाने की जरूरत है। इसके लिए राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर नीति और नियामक ढांचे को सुव्यवस्थित करना और जरूरत के वक्त सिस्टम ऑपरेटर द्वारा सही तरीके की सहायक सेवाओं की खरीद के लिए एक संतुलित बाजार को स्थापित करना शामिल है। 

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