हिन्दी के देश में हिन्दी की लड़ाई

शब्दवाणी समाचार, बुधवार 22 सितम्बर  2021, नई दिल्ली। क्या यह देश मुकेश जैन, श्यामरूद्र पाठक, डॉ० मुनीश्वर गुप्त, चन्द्र शेखर उपाध्याय और भानु प्रताप सिंह को जानता है ये वे लोग है जिनके लम्बे संघर्ष के चलते इंजीनियरिंग, चिकित्सा-विग्यान, विधि और अब प्रबन्धन के उच्च-पाठ्यक्रमों में हिन्दी भाषा पहली बार वैकल्पिक माध्यम बनी। लेकिन गुपचुप गणतंत्र रचते ये हिन्दीवीर गुमनामी के अंधेरे में है। यह नवअभियान अविभाजित उत्तर-प्रदेश (अब उत्तराखण्ड) से शुरू होकर दिल्ली हिन्दी के देश में हिन्दी की लड़ाई, सुनने में अजीब । इतना ही नहीं जब इन हिन्दीवीरों को विविध परीक्षाओं में हिन्दी में लिखने नहीं दिया गया तो विरोधस्वरूप वहां उत्तरपुस्तिकाएं भी उन्होंने जलायी। शुरूआत शामली के एक नौजवान मुकेश जैन ने की और केन्द्र बना रूड़की विश्वविद्यालय। १९८० में तब वहां आई०आई०टी० संस्थान नहीं था। रूड़की विश्वविद्यालय ही इंजीनियरिंग की परीक्षा आयोजित कराता था। धातुकर्म शाखा से बी०टेक० कर रहे मुकेश जैन ने रुडकी आने से पहले एक अंग्रेजी विरोधी संस्था बनाई थी। बी०टेक० करते हुए छात्रों के बीच इस बाबत उन्होंने हस्ताक्षर अभियान चलाया कि न सिर्फ उत्तरपुस्तिकाएं हिन्दी में लिखी जाएं बल्कि प्रश्नपत्र भी हिन्दी में हों। तमाम बाधा-अवरोधों के पश्चात उन्हें सफलता मिली। १९८४ में चतुर्थ वर्षीय बी०टेक० पाठ्यक्रम हिन्दी भाषा में पूर्ण करने के पश्चात मुकेश जैन ने अंग्रेजी अनिवार्यता विरोधी मंच का गठन किया और मांग की कि देश में अन्य आई०आई०टी० संस्थानों में इंजीनियरिंग की प्रवेश परीक्षा हिन्दी में भी हो। 

वर्ष १९८४ में रूड़की में आयोजित इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा में मुकेश जैन की अपील पर कई विद्यार्थियों ने अपनी उत्तरपुस्तिकाएं हिन्दी में लिखी। कक्ष निरीक्षकों द्वारा रोके-जाने पर अनेक विद्यार्थियों ने अपनी उत्तरपुस्तिकाएं जला दी इस घटना को संवाद एजेन्सी पी०टी०आई० ने प्रमुखता से प्रकाशित किया था। अब मसला रूड़की तक का नहीं रहा, देश की राजधानी दिल्ली तक अंग्रेजी विरोधी बयार पहुंच गयी थी। बिहार के एक संस्कृत अध्यापक के पुत्र श्री श्यामरूद्र पाठक ने दिल्ली के आई०आई०टी० संस्थान में हिन्दी के समर्थन में मुहिम छेड़ दी। गांव की अतिसाधारणा पृष्ठभूमि से आये विलक्षण छात्र श्यामरूद्र पाठक ने वहां १९८५ में बी०टेक० (अंतिम वर्ष) की पढाई करते हुए जब अपनी प्रोजेक्ट रिपोर्ट हिन्दी भाषा में दाखिल करने की अनुमति मांगी तो आई०आई०टी० दिल्ली के निदेशकों ने इसे एक बेतुकी कोशिश बताया। इस पर श्यामरूद्र पाठक आन्दोलित हो गए। कठिन परिस्थितियों में बी०टेक० की परीक्षा में असाधारण अंक प्राप्त करने वाले श्यामरूद्र पाठक ने जब इंजीनियरिंग के परास्नातक (एम०टेक०) से पूर्व जीएआईईटी ग्रेजुएट एटीट्यूड इन इंजीनियरिंग टेस्ट की परीक्षा में देश भर में सर्वोच्च स्थान प्राप्त किया तब उस समय देश के पाँचों आई०आई०टी० संस्थान चौकन्ना हुए। एक प्रमुख अंग्रेजी समाचार-पत्र की संवाददाता पत्रलेखा चटर्जी ने श्यामरूद्र पाठक के संघर्ष का पूरा वृतान्त अपने समाचार पत्र में प्रमुखता से लिखा। अखिल भारतीय स्तर की इस कठिन परीक्षा में हिन्दी पृष्ठभूमि के श्यामरूद्र पाठक ने ९९-८९ प्रतिशत अंक प्राप्त किए थे। इसके पश्चात देश के कई प्रमुख हिन्दी दैनिक समाचार-पत्रों के वरिष्ठ पत्रकारों के लेखों ने श्यामरूद्र पाठक के अभियान को देशव्यापी बना दिया। अगस्त १९८५ में सांसद (अब स्वर्गीय) भगवत झा आजाद ने मामला संसद में उठाया। तत्कालीन लोकसभा अध्यक्ष श्री बलराम जाखड़ ने संग्यान लेते हुए मामला शिक्षा मंत्री के०सी० पन्त को प्रेषित किया और तत्काल प्रभावी कदम उठाने को कहा। भगवत झा आजाद द्वारा संसद को प्रेषित ग्यापन में ८५ सांसदों के हस्ताक्षर थे। राज्य सभा के तत्कालीन सदस्य कैलाशपति मिश्र ने ४५ सांसदों के हस्ताक्षर युक्त एक ग्यापन सभापति को सौंपा तथा हस्तक्षेप की मांग की। अपनी मांग पर निरन्तर पदयात्रा कर रहे श्यामरूद्र पाठक अब दिल्ली के शास्त्री भवन के बाहर धरने पर बैठ गए श्यामरूद्र पाठक से तब के प्रधानमंत्री श्री नरसिम्हाराव समेत अनेक बड़े नेता मिले। 

अन्त में केन्द्रीय शिक्षा मंत्रालय की पहल पर आई०आई०टी० संस्थानों की एक उच्चस्तरीय समिति ने श्यामरूद्र पाठक की हिन्दी भाषा में लिखी प्रोजेक्ट रिपोर्ट को स्वीकार करने की अनुशंसा की। हिन्दी की प्रतिष्ठा के इस अभियान की लपट अब दिल्ली से होती हुई आगरा तक पहुंच गयी थी। फिरोजाबाद के व्यवसायी परिवार के डॉक्टर पुत्र मुनीश्वर गुप्त ने सारे सुख-ऐश्वर्य ठुकराते हुए हिन्दी माध्यम से एम०डी० करने की घोषणा की। मुश्किलों का सामना करते हुए १९८७ में डॉक्टर मुनीश्वर गुप्त को हिन्दी भाषा में एम०डी० की उपाधि मिली। यह हिन्दी में दुनिया का पहला चिकित्सा शोध पत्र था। आगरा विश्वविद्यालय व सरोजनी नायडू मेडिकल कालेज को इसे स्वीकार करना पड़ा। १९९० में एल-एल०एम० की परीक्षा हिन्दी-माध्यम से कराने की मांग पर आगरा के ही चन्द्रशेखर उपाध्याय ने संघर्ष छेड़ दिया, तब तक एल-एल०एम० की परीक्षा सिर्फ अंग्रेजी माध्यम से ही होती थी। बताते चलें कि शहीदे आजम भगत सिंह आगरा के नूरी दरवाजा में रहे और बम बनाया, वही बम उन्होंने असेम्बली में फेंका। २३ मार्च १९३१ को भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव देश के लिए बलिदान हुए। उनकी शहादत के ठीक ५९ साल बाद २३ मार्च १९९० को चन्द्रशेखर आगरा विश्वविद्यालय के प्रांगण में भूख हड़ताल पर बैठ गए। तीन दिन तक विश्वविद्यालय प्रशासन न सिर्फ मूकदर्शक बना रहा बल्कि हठधर्मी रवैया अपनाते हुए तीसरे दिन मध्य रात्रि को सोते हुए चन्द्रशेखर उपाध्याय को उठा लिया गया और तम्बू उखाड़ दिए गए। इससे छात्रों में रोष फैल गया। चन्द्रशेखर उपाध्याय ने विद्यार्थियों से शिक्षण-संस्थाओं के बायकाट का आह्वान किया। विश्वविद्यालय प्रशासन के इस आतंक के खिलाफ २७ मार्च को आगरा में अपूर्व बन्द रहा। नाराज छात्रों ने शैक्षणिक-संस्थाएं बन्द करा दीं। चन्द्रशेखर का हौंसला बढ़ गया। चन्द्रशेखर फिर भूख-हड़ताल पर बैठ गए। विश्वविद्यालय प्रशासन को झुकना पड़ा, कुलपति मौके पर पहुंचे और कार्यालय में बात करने की बात कही, चन्द्रशेखर ने अस्वीकार कर दिया। छात्रों के बीच उन्होंने कुलपति से दो मांगे की। पहली एल-एल०एम० की परीक्षा में हिन्दी भाषा वैकल्पिक माध्यम हो, दूसरी आगरा विश्वविद्यालय के किसी भी विधि प्राध्यापक को एल-एल०एम० परीक्षा का दायित्व न दिया जाए। परीक्षा तिथि घोषित हो चुकी थी। कुलपति ने कहा कि प्रश्नपत्र अंग्रेजी में ही होंगे, परन्तु विद्यार्थी उसका उत्तर हिन्दी में भी लिख सकते है। चन्द्रशेखर ने अस्वीकार कर दिया। उनकी मांग थी कि प्रश्नपत्र में अंग्रेजी के साथ हिन्दी में भी प्रश्न पूछे जाएं। परीक्षाएं टल गयीं, लम्बी जद्दोजेहद के बाद कुलपति ने बार कौंसिल आफ इण्डिया और बार कौंसिल आफ उत्तर प्रदेश से इस बाबत अनुमति ली। 

यह पहला मौका था जब देश में एल-एल०एम० की परीक्षा हिन्दी में हो रही थी। चन्द्रशेखर ५४ प्रतिशत अंकों के साथा उत्तीर्ण हुए। १९९३ में दूसरे वर्ष की परीक्षा में हिन्दी में उत्तर लिखने पर चन्द्रशेखर को अनुत्तीर्ण कर दिया गया। फिर छात्र-संघर्ष समिति बनी। जोरदार आन्दोलनों, धरनों का लम्बा दौर चला। भरतपुर की तत्कालीन भाजपा सांसद राजकुमारी दीपा कौर ने संसद में हिन्दी के अपमान का प्रश्न उठाया। पूरे देश में इसकी गूंज हुई, हस्ताक्षर अभियान चला, छात्र संघर्ष समिति ने न्यायालय में जाने का ऐलान किया। उत्तर प्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल रोमेश भण्डारी के हस्तक्षेप पर कुलपति मंजूर अहमद के नेतृत्व में पांच सदस्यीय परीक्षा पुर्नमूल्यांकन समिति बनी, चन्द्रशेखर की उत्तर पुस्तिकाओं का पुर्नमूल्यांकन हुआ। जिन विषयों में चन्द्रशेखर को शून्य व तीन अंक दिए थे। उनमें उन्हें क्रमशः ७३ व ६९ अंक मिले, जो आपराधिक विधि के अब तक के सर्वोच्च अंक थे। हिन्दी भाषा में लिखी चन्द्रशेखर की उत्तर-पुस्तिकाओं को परीक्षक ने मानद पुस्तिकाओं के रूप में रखने की अनुशंसा की। इसके बाद तो हिन्दी माधयम के छात्रों के लिए विधि की सर्वोच्च उपाधि उत्तीर्ण करने का रास्ता खुल गया। आज भी अनेक विश्वविद्यालयों में छात्र हिन्दी माध्यम से एल-एल०एम० कर रहे हैं। एक लम्बा संघर्ष। कैरियर के बहुमूल्य सात वर्ष भेंट चढ़ गए। दो वर्ष की जगह सात वर्ष में एल-एल०एम० की डिग्री मिली। चन्द्रशेखर को हिन्दी भाषा के प्रति प्रेम के संस्कार मानो जन्म से घुट्टी में मिले थे जिसे वर्ष वे जन्मे, उसी वर्ष उनके पिता को हिन्दी आन्दोलन में जेल जाना पड़ा। माँ की गोद में यह सब उन्होंने निश्चित ही देखा-सुना होगा। माँ के अनवरत त्याग और संघर्ष से बचपन में ही हिन्दी के लिए कुछ करो का अंकुर पड़ गया था। आपातकाल में उनके पिता के स्वास्थ्य को गम्भीर आघात लगा जो अल्पायु में उनकी मृत्यु का कारण बना। जब चन्द्रशेखर एल-एल०एम० में हिन्दी की प्रतिष्ठा के लिए संघर्ष कर रहे थे तब उनके पिता दिवंगत हो चुके थे। उन्हीं के साथी प्राध्यापकों ने उनके पुत्र के हिन्दी भाषा में एल-एल०एम० करने के संकल्प को पूरा न होने देने की गरज से सभी वैध-अवैध हथकण्डे अपनाए थे लेकिन बाद में सभी को उस पवित्र संकल्प के आगे नतमस्तक होना पड़ा था। नब्बे का दशक लगभग हिन्दीवासियों के ही नाम रहा। नब्बे के दशक तक हिन्दी माध्यम से एल-एल०बी० करने वाले विद्यार्थियों को दिल्ली उच्च न्यायालय में वकालत करने की अनुमति नहीं थी वहां की बार कौंसिल का यह प्रतिबन्ध था। इस भाषाई अवरोध के खिलाफ पुष्पेन्द्र चौहान खडे़ हो गए थे। 

दस जनवरी १९९१ को पुष्पेन्द्र चौहान लोकसभा के अन्दर दर्शकदीर्घा से नारे लगाते हुए वहां कूद पड़े जहां प्रधानमंत्री समेत देश के शीर्षस्थ नेता थे। उनकी पसलियां टूट गयीं। ११ जनवरी को लोकसभा में उस प्रस्ताव को पुनः दोहराया गया, जो २६ मई १९८९ को उसने पारित किया था, जिसमें अंग्रेजी कैसे हटे? इसके लिए एक समिति बनाने का प्राविधान था। पुष्पेन्द्र चौहान इसके बाद भी अपनी मांग को लेकर जूझते रहे। अन्त में बार-कौंसिल से अथक प्रयत्नों के बाद दिल्ली उच्च न्यायालय में हिन्दी माध्यम से एल-एल०बी० करने वाले छात्रों को भी वकालत करने की अनुमति मिल पायी। हिन्दी के सम्मान के लिए चौदह साल तक शास्त्री भवन के बाहर धरना देने वाले पुष्पेन्द्र चौहान को आज हिन्दी के माध्यम से एल-एल०बी० करने वाले वो वकील भी नहीं जानते जो पुष्पेन्द्र की बदौलत आज दिल्ली उच्च न्यायालय में वकालत कर रहे हैं। इसी तपिश में एक नाम विनोद गौतम का भी है, विनोद गौतम ने कठिन परिस्थितियों में न सिर्फ ए०एम०आई० की प्रारम्भिक परीक्षा व पाठ्यक्रम में हिन्दी भाषा को वैकल्पिक माध्यम कराने की लड़ाई में सफलता प्राप्त की, बल्कि आने वाले विद्यार्थियों की सुविधा के लिए अपनी जेब से पैसा खर्च कर छह पुस्तकें भी लिखीं। तब तक अंग्रेजी माध्यम में ही उपलब्ध ए०एम०आई० व पॉलिटेक्निक की इन पुस्तकों का हिन्दी अनुवाद करने व उन्हें प्रकाशित करानें में विनोद गौतम को फांके तक करने पडे़ थे। १९८६-८७ में अजय मलिक ने जामिया-मिलिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी में हिन्दी का ध्वज उठा लिया। तब वहां एम०एड० अंग्रेजी व उर्दू में ही होता था। 

अजय मलिक ने कहा कि एम०एड० हिन्दी में भी हो। कड़ी मशक्कत के बाद यूनिवर्सिटी ने उनकी मांग को माना। वहां इस बाबत आन्दोलन भी चला। १९८६-८७ में एम०डी० की थीसिस हिन्दी में लिखने वाले डॉ० मुनीश्वर को तब एक लड़ाई और लड़नी पड़ी थी। सर्वोच्च न्यायालय के एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा गया कि देश भर के सभी मेडिकल कालेजों में एम०बी०बी०एस० और बी०डी०एस० की पन्द्रह-पन्द्रह प्रतिशत सीटों की परीक्षाएं सिर्फ अंग्रेजी भाषा में ही होगी, ये सीटे कुल १६०० थी। हिन्दी हित रक्षक समिति इस पर आन्दोलित हो गयी। सर्वोच्च न्यायालय के तीन जजों की पीठ ने लम्बी सुनवाई के बाद मामला केन्द्र सरकार को भेज दिया, प्रसिद्ध वकील श्री लक्ष्मीमल सिंघवी ने अदालत में तर्कपूर्ण जिरह की। लम्बी जद्दोजहद के बाद केन्द्र सरकार को स्वीकार करना पड़ा कि उपरोक्त सीटों की परीक्षाओं में विद्यार्थी अंग्रेजी के अलावा हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं में भी परीक्षा दे सकते है। अस्सी की शुरूआत में शुरू हुआ हिन्दी के मान सम्मान का चुनौती भरा सफर २१वीं सदी तक जारी है। अबकी फिर आगरा इसका पड़ाव बना। खांटी पत्रकार भानु प्रताप सिंह इस बार झण्डालम्बरदार बने। प्रबन्धन में हिन्दी भाषा में अपना शोध-पत्र स्वीकार कराने की मांग पर वो छह साल तक डटे रहे। उनके इस अभियान पर अंग्रेजीदां जमात का तर्क था कि अंग्रेजी न जानने वाले अच्छे प्रबंधक नहीं बन सकते। शुरू में बात ठीक ही लगती थी क्योंकि अंग्रेजी जानने वाले लोग ही प्रबन्धन के क्षेत्रों में शिखर पर आज दिखाई देते है। 

साधारण पृष्ठभूमि के भानु प्रताप सिंह को पत्रकारिता की सीढ़ी तक पहुंचने में ही नाको-चने चबाने पड़े थे, अपने अभियान पर आगा-पीछे सोचे बिना वो चल पड़े, अखबार की मामूली तनख्वाह में वो लड़ते रहे, जूझते रहे इसलिए कि गरीब का बेटा भी प्रबन्धन की बुलन्दियों पर आरूढ़ हो सकता है। केवल भाषाई अवरोध के कारण वो पायदान पर क्यों खड़ा रहे? उन्हें कामयाबी मिली। अपने शोध-पत्र में भानु ने न सिर्फ अपनी अट्ठारह साला पत्रकारिता के अनुभव लिखे बल्कि उस दौरान प्रशासन व प्रशासनिक अधिकारियों के मेलजोल की अपनी यादों को भी उड़ेल दिया। प्रबंधन के क्षेत्र में हिन्दी भाषा में लिखा यह दुनिया का पहला शोध पत्र है। इतनी कामयाबियों के बाद आज यक्ष प्रश्न यह है कि क्या अट्ठाईस वर्ष बाद भी हिन्दी, अंग्रेजी के मकड़जाल से मुक्त हो गई? क्या हिन्दी को उसका यथोचित सम्मान मिल गया? क्या हिन्दी रोजी-रोटी से जुड़ गयी? क्या अंग्रेजी के हैंगओवर से देश का प्रभुवादी, सुविधासम्पन्न, साधन भोगी समाज छिटक गया? उत्तर मिलता है, जी नहीं। किसी भी यात्रा का सबसे दुःखद परिणाम यह होता है कि लम्बी दूरी तय करने के बाद भी पथिक अपने को उसी बिन्दु पर खड़ा पाता है जहां से उसने यात्रा प्राम्भ की थी। देश की स्वतंत्रता के छह दशक से भी अधिक और हिन्दी के इस नवअभियान के अट्ठाईस वर्ष बीत जाने पर भी हिन्दी आज अघोषित आपातकाल की जद में है। अभी देश में नौ परीक्षाएं बड़े स्तर की ऐसी हैं जहां हिन्दी गायब है। इनमें एस०सी०आर०ए० और संघ लोक सेवा आयोग की कई परीक्षाएं शामिल हैं। २००३ में उत्तर प्रदेश में न्यायपालिका के हितों पर ऐसा भीषण कुठाराघात किया गया जो संभवतः अंग्रेजी के दुस्साहस से भी परे था, ऐसा करना अंग्रेजो के लिए भी नामुमकिन होता। 

उत्तर प्रदेश न्यायिक सेवा परीक्षा में २००३ से पहले १०० अंक का एक प्रश्नपत्र भाषा का होता था, जिसमें उर्दू (फारसी लिपि) में लिखे एक पैराग्राफ का हिन्दी में अनुवाद करना होता था या हिन्दी में एक पैराग्राफ को उर्दू में लिखना होता था तथा अंग्रेजी के एक पैरा को न्यायालय की सामान्य भाषा में अनुवाद करना होता था। २००३ के संशोधन के बाद भाषा के इस प्रश्न-पत्र में पूर्णांक १०० के स्थान पर २०० अंक कर दिये गए है। जिसमें ३० अंक अंग्रेजी निबंध, ६० अंक अंग्रेजी में सार लेखन, ४० अंक हिन्दी से अंग्रेजी में एक परिच्छेद का अनुवाद तथा ४० अंक अंग्रेजी से हिन्दी अनुवाद के लिए सुरक्षित कर दिए गए हैं। कितनी बिडम्बना की बात है कि वर्तमान उत्तराखण्ड और तब का अविभाजित उत्तर-प्रदेश जहां से अंग्रेजी के वर्चस्व को समाप्त करने का अभियान शुरू हुआ। उस उत्तराखण्ड के अधिवक्ता हिन्दी भाषा के माध्यम से उच्च न्यायिक सेवा (एच०जे०एस०) की परीक्षा में सम्मिलित नहीं हो सकते। इस अपमान के बाद टिप्पणी यह भी आती है कि अंग्रेजी न जानने वाला जिला-जज बनने के योग्य नहीं है। आज २००८ में भी उत्तराखण्ड में यह दृश्य है कि हिन्दी भाषा को माध्यम बनाने वाले अधिवक्ता उच्च न्यायिक सेवा (एच०जे०एस) की परीक्षा में सम्मिलित नहीं हो सकते। जिस उत्तराखण्ड में वर्ष २००४ में ही उच्च-न्यायालय में हिन्दी भाषा में प्रतिशपथपत्र दाखिल हो गया हो। आज वहां मुकदमों की सुनवाई, बहस और प्रक्रिया सभी अंग्रेजी में ही है जबकि केशवानन्द भारती बनाम् राज्य १९७३ सुप्रीम कोर्ट में उच्च न्यायालय में हिन्दी भाषा में भी समस्त कामकाज निपटान की व्यवस्था दी गयी है।

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