बजट के दौरान और बाद में कैसे रहे बाजार

शब्दवाणी समाचार, मंगलवार 1 मार्च 2022, नई दिल्ली। बजट को लेकर बीते समय में शेयर बाजार की प्रतिक्रियायें अलग-अलग रही हैं और यह अर्थव्‍यवस्‍था पर पड़ने वाले बजट के संपूर्ण प्रभाव पर निर्भर करता है। बाजार के घंटों के दौरान बजट प्रस्‍तुत करने का एक जो प्रमुख कारण है वह यह कि बजट संबंधी आवंटन और नीतिगत घोषणाओं को लेकर उद्योग से वास्‍तविक समय में प्रतिक्रियायें मिलती हैं। यही नहीं, शेयरों की गतिविधियां भी स्‍वभाव से बेहद अनिश्चित होती हैं और वास्‍तविक घोषणाओं एवं कुछ विशिष्‍ट नीतिगत अपेक्षाओं से काफी पहले लगाए जाने वाले अनुमान में होने वाले उतार-चढ़ाव बजट के महत्‍व को निर्धारित करते हैं। पिछले 11 सालों में, शेयर बाजारों ने चार बार बजट के दिन काफी रैली दिखाई, जबकि मौजूदा बाजार सूचकांक के मूल्‍यों से अंतरिम बजट के दिनों सहित इसमें सात बार गिरावट दर्ज की गई या फिर मिली-जुली प्रतिक्रिया देखने को मिली। यदि हम पिछले दशक पर खासतौर से ध्‍यान के‍न्द्रित करते हैं, तो 2020 में शेयर बाजार में बजट के दिन 2009 से सबसे अधिक गिरावट देखने को मिली है। 

बीते दशक में बजट के दिन की प्रतिक्रियायें 

महामारी का असर बाजारों के लिए मिलाजुला रहा है। कई लोगों को बबल फॉर्मेशन को बढ़ावा मिलने से खुदरा निवेश में वृद्धि नजर आ रही है। 2020 के बाद से इस बबल का फूटना चर्चा का विषय रहा है। हालांकि, बाजारों ने व्‍यापक तौर पर खुद को संभाल लिया है। बाजार में आया करेक्‍शन फौरन सुधर गया और 2021 की बजट घोषणाओं के दिन बाजारों में 5% की बढ़ोतरी देखी गई। आईये, पिछले वर्षों में बजट के दिन की अनिश्चितता की विशेषताओं को समझने की कोशिश करते हैं। 

2011 – श्री प्रणब मुखर्जी द्वारा प्रस्‍तुत बजट को लेकर सकारात्‍मक प्रतिक्रिया देखने को मिली थी। इसका श्रेय उनके कॅरियर के दौरान विभिन्‍न बजट पेश करने में उनके अनुभव को दिया जा गया। 

2012- श्री प्रणब मुखर्जी का आखिरी बजट अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरा। आम बजट में प्रस्‍तुत अवास्‍तविक अनुमानों को लेकर तय ट्रैक रिकॉर्ड ने उद्योगपतियों को हताश किया।  निवेशक भी खराब प्रदर्शन करने वाली अर्थव्‍यवस्‍था को लेकर चिंतित थे। 

2013 – वित्‍त मंत्री चिदंबरम द्वारा प्रस्‍तुत बजट को भी बाजारों की नकारात्‍मक प्रतिक्रिया मिली जबकि यह साल के लिए एक संतोषजनक और जनवादी बजट था। कई सालों से देश पर मंडरा रहे कमजोर बृहद आर्थिक ढांचे और मंदी के कारण ऐसा हुआ। 

2014 – मोदी सरकार का पहला बजट श्री अरुण जेटली ने प्रस्‍तुत किया था और इसमें बाजार की मिलीजुली प्रतिक्रिया देखने को मिली। इस साल बेहद उपेक्षापूर्ण अंतरिम बजट लाया गया था और कार्यालय में नए पद ग्रहण करने का सिलसिला चल रहा था, इसलिए बाजार से किसी भी तरह की सकारात्‍मक प्रतिक्रियायें पाने के लिए बजट में काफी उलट-फेर होना ही था। 

2015 – जैसा कि पहले चर्चा की जा चुकी है, बाजार सत्र के दौरान बजट प्रस्‍तुत करने के महत्‍व के कारण इस बजट के लिए शनिवार को बाजार खुला रखने का फैसला किया गया। बजट को लेकर प्रतिक्रियायें संतुलित थीं और आवधिक मुनाफा वसूली के कारण इस दिन थोड़ा सा नुकसान ही हुआ। 

2016 – इस बजट को एक बार फिर बाजारों से नकारात्‍मक प्रतिक्रिया मिली। 

2017 – 2010 के बाद से यह बजट सबसे सफल बजट के तौर पर देखा जा सकता है। बाजारों ने इंट्रा-डे के दौरान भारी-भरकम लाभ प्राप्‍त किया। तत्‍कालीन वित्‍त मंत्री श्री अरुण जेटली ने बजट प्रस्‍तुत करने का दिन बदलकर 1 फरवरी किया, और तब से इसी दिन बजट प्रस्‍तुत किया जा रहा है। 

2018 – बजट ने बाजारों के लिए कोई चमत्‍कार नहीं किया। बाजार ने शुरूआत में नकारात्‍मक रूप से प्रतिक्रिया दी, लेकिन दिन का अंत मामूली नुकसान के साथ हुआ। 

2019- श्री पीयूष गोयल ने अंतरिम बजट पेश किया और इसे बाजारों से अच्‍छी प्रतिक्रिया मिली। हालांकि, श्री निर्मला सीतारमण द्वारा पेश किये गये फाइनल बजट से पहले कॉर्पोरेट टैक्‍स की दरें उच्‍च रहने का अंदाज लगाने और ईंधन की कीमतों से महंगाई बढ़ने के कारण एक्‍सचेंजों में कुछ बड़ी अनिश्चितता थी। 

2020- बीते 11 वर्षों में इस बजट में सबसे भारी गिरावट देखने को मिली। इसका एक सबसे प्रमुख कारण था चारों ओर महामारी फैलने का खतरा और अन्‍य कारणों में शामिल थे - बढ़ती महंगाई और निवेश पर वैकल्पिक कर प्रणाली का असर। 

2021 – महामारी के डर के बीच लेंडिंग संबंधित नियमों में राहत और उद्योग से मिले सहयोग ने पूरे देश भर में यह बजट खुशियां देने वाला रहा। भारत के अपनी तरह के पहले डिजिटल बजट ने पूरे कारोबारी दिवस पर उल्‍लेखनीय लाभ आकर्षित किया। 

मौजूदा बजट 

इस बजट के लेकर बाजार की प्रतिक्रियायें मिली-जुली हैं, कई उद्योगों के लिए यह लाभदायक है तो वहीं कुछ इस पर खामोश हैं। पर कुल मिलाकर संपूर्ण परिदृश्‍य सकारात्‍मक है। बजट बाजारों के लिए व्‍यापक तौर पर उदासीन है। इसका श्रेय इस बात को दिया जा सकता है कि शेयर बाजारों ने कोविड-19 महामारी के कारण जनवादी बजट की उम्‍मीद नहीं की थी। यही नहीं, भविष्‍य की गतिविधियां इस बात पर ज्‍यादा निर्भर करेंगी कि यूएस फेड कैसे तेजी से टेपरिंग की ओर बढ़ता है और 2022 में दरों में बढ़ोतरी भी प्रमुख भूमि‍का निभायेगी। कोविड-19 संकट को देखते हुए, यूएस फेड सिस्‍टम में रिकॉर्ड मात्रा में तरलता लेकर आया है। साथ ही ब्‍याज दरों को लगभग शून्‍य के स्‍तर पर रखा गया है जिससे बाजारों को काफी सहयोग मिला। हालांकि, फेड ने स्‍पष्‍ट संकेत दिया है कि वे मार्च तक अपनी क्‍वांटीटेटिव ईजिंग(क्‍यूई) को कम  करेंगे और महंगाई के बेहद उच्‍च स्‍तर को देखते हुए 2022 में दरों में कम से कम 75 बेसिक अंकों की बढ़ोतरी की जाएगी। इससे 2022 के दौरान तरलता में थोड़ी गिरावट आ सकती है। इसलिए सजग रहने की सलाह दी जाती है। 

निष्‍कर्ष 

बजट मध्‍यम अवधि में बाजार के रुख का फैसला करने में मदद करता है लेकिन बाहरी घटक भी इस रुख को दिशा देने में काफी महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यूएस फेड द्वारा मौद्रिक नीति को सख्‍त करने की तीव्र अपेक्षाओं ने भारतीय रुपये के अवमूल्‍यन को बढ़ावा दिया है और इस वजह से एफआइआइ भारतीय इक्विटीज से बाहर निकल रहे हैं। बाजार में कई सारे उद्योग मौजूद हैं, ऐसे में व्‍यावहारिक तौर पर यह असंभव है कि बजट में सभी उद्योगों के लिए कुछ सकारात्‍मक हो। बजट में कुछ प्रासंगिक सुधारों को बहुत अच्‍छे से संभाला जा सकता है। पिछले साल 9.5 प्रतिशत की प्रभावशाली जीडीपी ग्रोथ के साथ, जोकि इससे पहले 7.5 प्रतिशत के स्‍तर तक पहुंच गई थी, एशिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्‍यवस्‍था बनने की संभावनायें काफी उज्‍जवल नजर आती हैं। चालू बजट में पूंजीगत व्‍यय (कैपेक्‍स) पर अधिक फोकस किया गया है, ऐसे में ज्‍यादा से ज्‍यादा योजना बनाना और एक दूरदृष्टि तय करना निश्चित रूप से भारत को काफी आगे लेकर जाएगा।

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