शस्त्र और शास्त्र के अद्भुत संगम भगवान परशुराम

◆ अन्याय के प्रतिकारक भगवान परशुराम

शब्दवाणी समाचार, मंगलवार 3 मई 2022, गौतम बुध नगर। भगवान विष्णु के छठवें अवतार भगवान परशुराम का जन्म भृगु वंश में हुआ। पिता का नाम महर्षि जमदग्नि और माता का नाम रेणुका। महर्षि जमदग्नि ने पुत्रेष्टि यज्ञ किया जिससे प्रसन्न होकर देवराज इंद्र ने वरदान दिया। रेणुका के गर्भ से वैशाख शुक्ल तृतीया को भगवान परशुराम का जन्म हुआ वह अपनी माता पिता की पांचवीं संतान थे।  जन्म के बाद उनका नामकरण संस्कार किया गया और राम नाम रखा गया। जमदग्नि के पुत्र होने के कारण उन्हें जामदग्नेय तथा भृगु वंश में जन्म लेने के कारण भार्गव नाम से भी जाना गया। माता रेणुका से प्रारंभिक शिक्षा ग्रहण की ततपश्चात महर्षि विश्वामित्र और महर्षि ऋचीक के आश्रम में शिक्षा प्राप्त की। परशुराम जी की योग्यता से प्रभावित होकर महर्षि ऋचीक ने उन्हें सारंग नामक दिव्य धनुष  एवं महर्षि कश्यप ने वैष्णवी मन्त्र प्रदान किया। भगवान शिव के परम भक्त थे उन्होंने कैलाश पर कठोर तप कर भगवान भोलेनाथ को प्रसन्न कर लिया। भगवान भोलेनाथ ने परशु दिया जिसके कारण उनका नाम परशुराम पड़ा।

भगवान परशुराम का जन्म जरूर ब्राम्हण कुल में हुआ लेकिन उन्होंने क्षत्रियोचित व्यवहार कर वर्ण व्यवस्था की उस धारणा को मिथ्या साबित किया कि मनुष्य का वर्ण जन्म से निर्धारित होता है कर्म से नहीं। जब पृथ्वी पर अनाचारियों का अनाचार बढ़ने लगा और राज सत्ता के मद में चूर राजाओं ने ऋषि ,मुनियों और जनता पर अत्याचार किया तब भगवान परशुराम ने ऐसे अनाचारियों का वध कर शांति की स्थापना की। वह नारी सम्मान के प्रति सदैव सजग रहे उन्होंने ऋषि अत्रि की पत्नी अनुसुइया, अगस्त की पत्नी लोपमुद्रा के साथ नारी जागृति हेतु प्रयास किया। भगवान परशुराम के शिष्य भीष्म ने जब काशीराज की पुत्री अम्बा का अपहरण कर लिया तो अम्बा के आग्रह पर नारी सम्मान की रक्षा हेतु भीष्म से भयंकर युद्ध किया और पुरुषों के लिए एक पत्नी के धर्म का निर्देश दिया।

एक बार की बात है कि महिष्मती नगर के हैहयवंशी शासक कीर्तिवीर्यार्जुन ने भगवान दत्तात्रेय की कठोर तपस्या की , तपस्या से भगवान प्रसन्न हुए और उन्होंने वरदान मांगने को कहा। कीर्तिवीर्यार्जुन ने सहस्त्र भुजाएं एवं अपराजित होने का वरदान मांगा। सहस्त्र भुजाओं के कारण उसका नाम सहस्त्रबाहु पड़ा। अपनी शक्ति के अहंकार में सहस्त्रबाहु  ऋषि जमदग्नि के आश्रम पहुंचा और वहां पर कपिला कामधेनु को देखा जिसे देवताओं के राजा इंद्र ने प्रदान किया था। अहंकार के वशीभूत होकर सहस्त्रबाहु ने जबरन कामधेनु का हरण कर लिया। जब भगवान परशुराम को सहस्त्रबाहु के इस कृत्य का पता लगा तब उन्होंने सहस्त्रबाहु की हजार भुजाओं को काटकर उसका वध कर दिया और कामधेनु को सम्मान सहित पिता के आश्रम लाये। पिता की आज्ञा से सहस्त्रबाहु के वध का प्रायश्चित्त करने के लिए भगवान  परशुराम तप करने चले गए। मौका पाकर हैहयवंशी राजाओं ने महर्षि जामदग्न्य की आश्रम में हत्या कर दी।  माता रेणुका ने विलाप करते हुए परशुराम को पुकारा, उन्होंने आश्रम आकर देखा तो मृत पड़े पिता के शरीर पर इक्कीस घाव थे । उन्होंने उसी समय प्रण किया कि जब तक पृथ्वी को हैहयवंशी राजाओं से मुक्त नहीं कर देता तब तक चैन से नहीं बैठूंगा। उन्होंने हैहयवंशी राजाओं को परास्त कर सम्पूर्ण भूमि को महर्षि कश्यप को दान कर दी।

सीता स्वयंबर में जब राजा जनक ने प्रण लिया कि जो भगवान शंकर के धनुष अजगव को तोड़ेगा उसी के साथ सीता का विवाह होगा। तमाम बलशाली राजाओं ने प्रयास किया लेकिन धनुष नहीं तोड़ सके अंत में भगवान राम धनुष को तोड़ते हैं और सीता के साथ उनका विवाह हो जाता है। धनुष टूटने की आवाज सुनकर भगवान परशुराम जनकपुर पहुंचते हैं और राजा जनक पर क्रोधित होते हैं और जो दुष्ट राजा होते हैं उन्हें देखकर छुप जाते हैं। भगवान राम उन्हें प्रणाम करते है , जब परशुराम जी जान जाते हैं कि राम स्वयं विष्णु का अवतार हैं तो उनसे आज्ञा लेकर महेंद्र पर्वत पर तपस्या करने चले जाते हैं। पितामह भीष्म, दानवीर कर्ण, आचार्य द्रोण भगवान परशुराम के शिष्य थे। भगवान परशुराम ने इन्हें शस्त्र विद्या में पारंगत किया था। यज्ञ करना उनकी दैनिक दिनचर्या थी इसके लिए उन्होंने बत्तीस हाथ की सोने की बेदी बनवाई जिसे बाद में महर्षि कश्यप ने ले लिया था। साथ ही महर्षि कश्यप ने परशुराम से पृथ्वी छोड़कर चले जाने को कहा उनकी बात मानकर परशुराम ने समुद्र को पीछे हटाकर महेंद्र पर्वत पर चले गए।

ब्रम्हवैवर्त पुराण में कथानक मिलता है कि एक बार भगवान परशुराम भगवान शिव से मिलने कैलाश पर्वत पहुंचे लेकिन गणेश जी ने उन्हें रोक दिया इस बात से परशुराम कुपित हो गए और फरसे का प्रहार कर दिया जिससे उनका एक दांत टूट गया जिसके कारण गणेश जी को एकदन्त भी कहा जाने लगा। स्कंध पुराण के अनुसार परशुराम ने अठ्ठासी हजार स्वयंभू शिवलिंगों की खोज की थी और एक हजार से अधिक शिवालयों की स्थापना की थी। तिरुपति के गुडिमल्लम गांव से तीस किलोमीटर दूर कालहस्ती वायुतत्व शिवलिंग के नजदीक एक स्वयंभू शिव मंदिर जिसे परशुरामेश्वर मंदिर के नाम से जाना जाता है। ऐसा माना जाता है कि भारत के अधिकांश गांव परशुराम के बसाए हुए हैं। मुम्बई से कन्याकुमारी तक के क्षेत्र को आठ भागों में विभाजित कर सूर्याष्टक प्रान्त बनाया था । गऊ धाम ( गोवा) भी इन्हीं का बसाया नगर है।

भगवान परशुराम में परशु शब्द पराक्रम को इंगित करता है वहीं राम जो सबके लिए कल्याणकारी हैं।शस्त्र और शास्त्र का अद्भुत संगम हैं भगवान परशुराम। हम कह सकते हैं कि जो पराक्रम से सबका कल्याण करता हो । भगवान शिव द्वारा प्रदत्त शस्त्र परशु या परसा जिसकी व्याख्या की जाए तो प से पार्वती र से रमा और स से सरस्वती तीनों शक्तियां परसा में समाहित हों इसका मतलब दुष्टों का संघार करने वाली  मां पार्वती, रमा के रूप में माता लक्ष्मी और बुद्धिस्वरूपा मां सरस्वती । जब तीनों शक्तियां शस्त्र में समाहित हों तो कौन सामना कर सकता है। परशु अराजकता का संघारक है तो राम कल्याणकारी है रक्षक है। भगवान परशुराम जी का चरित्र हमें शिक्षा देता है कि शक्ति का उपयोग शांति की स्थापना के लिए होना चाहिये। दुष्ट राजाओं को परास्त कर सारी सम्पदा और जमीन ब्राम्हणों को दान में दे दी। खुद राजसत्ता का उपभोग नहीं किया। भगवान परशुराम का जीवन सत्ताधीशों को त्यागपूर्ण आचरण की शिक्षा देता है वहीं शोषित, पीड़ित जनमानस को भी उसकी शक्ति और सामर्थ्य का अहसास दिलाता है। उन्होंने अहंकारी राजतन्त्र को मिटाकर लोकतंत्र की स्थापना की अश्वत्थामा, राजा बलि, महर्षि व्यास, हनुमान जी, विभीषण, कृपाचार्य, मार्कण्डेय के साथ भगवान परशुराम को जिरंजीवी कहा जाता है। भगवान परशुराम की जयंती पर हम यही आशीर्वाद मांगते हैं कि वह हमारे मनोविकारों, ईर्ष्या, द्वेष ,अहंकार , काम, क्रोध का समूल नाश कर दें। भगवान परशुराम के चरणों में प्रणाम करता हुआ सभी के कल्याण की कामना करता हूँ।

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