शरीर और मन से क्रिया शील व्यक्ति ही स्वस्थ : योगाचार्य श्रुति सेतिया

◆ अस्वस्थता का कारण और निवारण पर गोष्ठी

शब्दवाणी समाचार, मंगलवार 5 जुलाई 2022, गाजियाबाद। केन्द्रीय आर्य युवक परिषद् के तत्वावधान में "हमारी अस्वस्थता का कारण और निवारण" विषय पर ऑनलाइन गोष्ठी का आयोजन किया गया। यह कोरोना काल में 413 वां वेबिनार था। मुख्य वक्ता योगाचार्य श्रुति सेतिया ने कहा कि मन और शरीर से पूर्णतया क्रियाशील व्यक्ति ही स्वस्थ कहा जा सकता है।उन्होंने कहा कि कोई आदमी तभी तक अपने जीवन का पूरा आनंद उठा सकता है जब तक वह शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ रहे। स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क निवास करता है।

इसीलिए मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी शारीरिक स्वास्थ्य अनिवार्य है। ऋषियों  ने कहा है "शरीरमाध्मखलु धर्म साधनम् " अर्थात यह शरीर ही धर्म का श्रेष्ठ साधन है।यदि हम स्वयं को धार्मिक कहते हैं तो अपने शरीर के स्वास्थ्य का ध्यान रखना हमारा पहला कर्तव्य है।यदि शरीर स्वस्थ नहीं है तो जीवन भार स्वरूप हो जाता है।यजुर्वेद में निरंतर कर्मरत्त रहते हुए 100 वर्ष तक जीने का आदेश दिया गया है। हम 100 वर्ष तक देखें,जिये, सुने,बोले और आत्मनिर्भर रहें, ईश्वर की कृपा से कोई रोग हो जाने पर क्रियाशीलता में कमी आती है इसलिए स्वास्थ्य भी प्रभावित होता है।आयुर्वेद के प्रसिद्ध ग्रंथ सुश्रुत संहिता में ऋषि ने लिखा है जिसके तीनों दोष - वात,पित्त और कफ समान हो, जठराग्नि सम हो,शरीर को धारण करने वाली सात धातुएं - रस,रक्त, मांस,मेद,अस्थि,मज्जा और वीर्य उचित अनुपात में हो,मल मूत्र की क्रिया भली प्रकार होती है और दसों इंद्रियों -आंख,नाक,कान, त्वचा,रसना,हाथ,पैर,जिभ्या,गुदा और उपस्थ,मन और  सबकी स्वामी आत्मा भी प्रसन्न हो तो ऐसे व्यक्ति को स्वस्थ कहा जाता है।

हम जीवन में जो कुछ भी करते हैं,वह शरीर के बल पर ही करते हैं और आगे भी तब ही कर पाएंगे जब शरीर को स्वस्थ और सबल रख पाएंगे,क्योंकि हमारे जीवन की यात्रा हम इस शरीर रूपी वाहन में बैठकर ही करते हैं।  इसलिए हमें अपने स्वास्थ्य की रक्षा करनी होगी।यह प्रयत्न हमें छोटी आयु से ही शुरु कर देने होंगे ताकि अभी से हमारा शरीर निरोगी और बलवान रह सके, और हमारी जीवन यात्रा शुरू से ही सही दिशा में जा सके।हितकारी आहार-विहार करने वाला,विचार पूर्वक काम करने वाला,काम- क्रोध आदि मानसिक  रोगों में लिप्त ना रहने वाला,दान देने वाला,सबको समान दृष्टि से देखने वाला,सत्य बोलने वाला, सहनशील और विद्वानों के बताए निर्देशों का पालन करने वाला व्यक्ति निरोगी रहता है।अधिकांश लोग अच्छे स्वास्थ्य के महत्व को नहीं समझते और अगर समझते भी हैं तो अभी तक इसकी उपेक्षा कर रहे हैं।हमें स्वास्थ्यकर जीवनशैली अपनानी चाहिए।  यदि हम खोये हुए स्वास्थ्य को पुनः प्राप्त करना चाहते हैं और रोजमर्रा के जीवन में प्रभाव कारी एवं निपुण बने रहना चाहते हैं तो सर्वोत्तम मार्ग है कि शरीर को विषैले पदार्थ बाहर निकालने में सहायता करना।स्वस्थ रहने के लिए स्वस्थकारी जीवन शैली ही निश्चित और सर्वोत्तम तरीका है।  

घर और कार्यालयों के आसपास स्वच्छता बनाए रखना,प्राकृतिक वायु एवं प्रकाश में खूब समय बिताना,ठीक मुद्रा में बैठना और उठना,त्वचा के स्वास्थ्य का ध्यान रखना,तंत्रिकाओं को उत्तेजित करने वाले पदार्थों से बचाना, भोजन कम खाना,कच्ची या थोड़ी पकी हुई ताजी सब्जियां,ताजे फल और कच्चा सलाद अधिक लेना आदि,यह सब स्वस्थ जीवन शैली के उपाय हैं।सर्वप्रथम तो बीमारी के होने के कारणों को जानना और फिर उस बीमारी के कारण उत्पन्न असुविधा से छुटकारा पाने के लिए प्रयास और पुनः स्वास्थ पाने के लिए शरीर की सहायता करके ही हम बीमार पड़ने के भय से छुटकारा पा सकते हैं।

केन्द्रीय आर्य युवक परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष अनिल आर्य ने कुशल संचालन करते हुए जीवन शैली में बदलाव लाने पर बल दिया। मुख्य अतिथि उषा सूद(हरिद्वार) व अध्यक्ष सविता भटनागर ने भी जीवन उपयोगी सुझाव दिए। राष्ट्रीय मंत्री प्रवीण आर्य ने योग के महत्व पर प्रकाश डाला और देनिक जीवन में अपनाने पर बल दिया। गायिका प्रवीना ठक्कर, कुसुम भंडारी,रजनी चुघ,बिंदु मदान, राजश्री यादव, कमलेश चांदना, प्रतिभा खुराना, सोनल सहगल, चंद्रकांता आर्या,रविन्द्र गुप्ता, नरेशप्रसाद आर्य,कैप्टन अशोक गुलाटी,जनक अरोड़ा,उषा मिगलानी आदि ने मधुर भजन सुनाये।

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