पं.राजगुरु का बलिदान युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत : अनिल आर्य

 

शब्दवाणी समाचार, वीरवार 25 अगस्त 2022गाजियाबाद। केन्द्रीय आर्य युवक परिषद के तत्वावधान में "मेरा राष्ट्र-मेरा अभिमान" विषय पर ऑनलाइन गोष्ठी व अमर शहीद राजगुरु की 114 वीं जयंती पर श्रद्धांजलि अर्पित की गई । उल्लेखनीय है कि अमर शहीद भगत सिंह,राजगुरु व सुखदेव को 23 मार्च 1931 को लाहौर में इकठ्ठे फांसी दी गई थी।यह कोरोना काल में 433 वां वेबिनार था। मुख्य वक्ता डॉ. कल्पना रस्तोगी ने कहा की किसी भी व्यक्ति की वास्तविक पहचान उसके अपने राष्ट्र से ही  होती है,क्योंकि हमारा अस्तित्व इसी से जुड़ा है,यदि हमारा राष्ट्र सुरक्षित है,तो उसमे हम भी सुरक्षित हैं और हमारा राष्ट्र फले फूलेगा तो हमें भी फलने फूलने,आगे बढ़ने  के अवसर मिलेंगे।जिस प्रकार हमारी रगों में खून दौड़ता है,उसी प्रकार राष्ट्र भक्ति का विचार भी हमारी रगों में दौड़ना चाहिए।परन्तु प्राय: देखा जाता है कि जब भी कोई राष्ट्रीय पर्व आता है तो खून में राष्ट्र भक्ति का उबाल आ जाता है।

परन्तु धीरे धीरे यह शांत भी होने लगता है और हम पूर्व की भांति अपने अपने कार्यो में,व्यवसायों में व्यस्त हो जाते हैं,लेकिन मेरे विचार से इन राष्ट्रीय पर्वों का स्वरूप कुछ रचनात्मक होना चाहिए जैसे इन पर्वों को कुछ इस तरह मनाया जाए कि कुछ विचारशील लोग,अपने  मित्रो, सहकर्मियों आदि के साथ बैठें और राष्ट्र की समस्याओ पर ध्यान दें,उनसे मुक्त होने के लिए  क्या किया जा सकता है,हम अपना  क्या योगदान दे सकते हैं आदि विषयो पर विचार गोष्ठियां करें, लेख लिखें लोगो को जागरूक करें।जिनमे समाज के हर वर्ग की हिस्सेदारी हो,साथ बैठकर,कुछ समाधान ढूंढे जाए तो,मेरे विचार से  इन पर्वों को मनाने की सार्थकता अधिक होगी क्योंकि राष्ट्र तो हम सबका है।परन्तु  कुछ प्रतिशत लोग आज भी ऐसे अवश्य  हैं जिनके मन में  देश की परिस्थितियों को सकारात्मक रूप से बदलने के विचार निरंतर हिलोरें मारते रहते हैं।

ये वे लोग है, जिनके माता पिता ने उनमें राष्ट्र प्रेम की लौ जगाई है।मैं बहुत ही गर्व से कहना चाहती हूँ कि जो सच्चे आर्य परिवार हैं ,उनके रगों में आज भी देशभक्ति भरी पड़ी है क्योंकि हमारे समाज के प्रवर्तक ही महर्षि दयानन्द एक सच्चे राष्ट्रभक्त थे,जिन्होंने स्वराज्य पाने की अलख जगाई।आज भी सबसे अधिक राष्ट्र चिंतन यदि किसी समाज में होता है तो वह  आर्यसमाजों में ही होता है।भारत देश की अमूल्य धरोहरें वेद, पुराण,महाभारत,रामायण,गीता जैसे शाश्वत ग्रंथों पर,ऋषि संस्कृति पर,भारत की अभूतपूर्व और गौरवमयी गरिमा पर बात यहीं  होती है।राष्ट्र की बात हो तो हमारे महापुरुष मर्यादापुरुषोत्तम राम का नाम लिए बिना नहीं रहा जा सकता  जिन्होंने कहा  --अपि  स्वर्णमयी लंका न में रोचते लक्ष्मण।जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।अर्थात हे लक्ष्मण ये लंका भले ही स्वर्ण निर्मित है,परन्तु इस  सोने की लंका में  भी मेरी कोई रुचि नहीं है। मेरे लिए तो मेरी मातृभमि  स्वर्ग से भी बढ़कर है।ये थे राष्ट्रीय चेतना के स्वर और श्री कृष्ण ने जीवन भर राष्ट्र धर्म निभाया,राष्ट्र को एकता के सूत्र में बाँधने का कार्य किया।आज 'राष्ट्र प्रथम' की अपेक्षा 'स्वार्थ प्रथम' की भावना पनप रही है जिस पर रोक लगनी चाहिए।अपने राष्ट्र को आगे बढ़ने के लिए हमें विदेशी वस्तुओ का मोह और प्रयोग छोड़ना ही होगा। 

हमें भ्रमण के लिए अन्य स्थानों के साथ साथ ऐसे ऐतिहासिक स्थलों  पर अवश्य जाना चाहिए जहाँ  से हमारा गौरवपूर्ण इतिहास जुड़ा हो। एक-दूसरे से जितना भी सम्भव हो अपनी मातृभाषा अथवा राष्ट्रभाषा में ही संभाषण करें।यदि हम ही अपनी भाषा अपनी संस्कृति का संम्मान नहीं करेंगे तो दू सरो से क्या अपेक्षा कर सकते हैं। केन्द्रीय आर्य युवक परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष अनिल आर्य ने कहा कि यह राष्ट्र की स्वतंत्रता शहीदों के बलिदान से ही मिली है प.राजगुरू जी का आज 114 वां जन्मदिन है हमारे लिए उनके बलिदान को याद कर प्रेरणा लेने का दिन है विशेष कर युवाओं को उनसे प्रेरणा लेकर राष्ट्र रक्षा का संकल्प लेना चाहिए। मुख्य अतिथि गायत्री मीना(मंत्री आर्य समाज नोएडा) व सुरेश हसीजा ने भी अपने श्रद्धासुमन अर्पित किये। राष्ट्रीय मंत्री प्रवीण आर्य ने कहा कि राष्ट्र रहेगा तो हम सब रहेंगे। इस अवसर पर देश भक्ति के गीत भी प्रस्तुत किये गए।

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