भारत को वैश्विक निर्यात केंद्र बनाने हेतु स्वदेशी ईवी बैट्री का निर्माण : रिपोर्ट

 

• भारत को 2030 तक लिथियम-आयन बैटरी की केवल स्थानीय मांग को पूरा करने के लिए सेल निर्माण और कच्चे माल के शोधन को बढ़ावा देने हेतु $10 बिलियन से अधिक का निवेश करने की आवश्यकता है; इससे 1 मिलियन+ नई नौकरियों का हो सकता है सृजन

• जबकि भारत की लिथियम-आयन बैटरी की मांग मौजूदा 3 गीगावाट घण्टा से बढ़कर 2026 तक 20 गीगावाट घंटा और 2030 तक 70 गीगावाट घंटा हो जाएगी, 70% आवश्यकता पूरी करने के लिए चीन से आयात किया जाता है 

• बिजली से चलने वाले वाहनों (ईवी) के किफायतपन और सुरक्षा को बढ़ावा देने के लिए सहयोगात्मक अनुसंधान एवं विकास, भारतीय जलवायु के हिसाब से नवीन सेल प्रौद्योगिकी एवं स्वदेशी बैटरी का निर्माण बेहद जरूरी 

• प्राकृतिक संसाधनों के अधिग्रहण से लेकर सेल्स के पुनर्चक्रण तक ईवी बैटरी मूल्य श्रृंखला में स्थानीयकरण को बढ़ावा देने वाली सहायक सरकारी नीतियों से ईवी को अपनाने को अधिकाधिक बढ़ावा मिलेगा 

शब्दवाणी समाचार, रविवार 2 अक्टूबर 2022, सम्पादकीय व्हाट्सप्प 8803818844, नई दिल्ली। स्वदेशी ईवी बैटरी निर्माण से स्थानीय स्तर पर ईवी के प्रयोग को बढ़ावा मिलेगा और भारत दुनिया का एक बड़ा निर्यात केंद्र बन सकेगा। हालांकि, 2030 तक लिथियम-आयन बैटरी की स्थानीय मांग को पूरा करने और 1 मिलियन नई नौकरियों के सृजन हेतु सेल निर्माण और कच्चे माल के शोधन को बढ़ावा देने के लिए राष्ट्र को $ 10 बिलियन से अधिक का निवेश करना होगा।" - आर्थर डी. लिटिल (एडीएल) द्वारा “ई-मोबिलिटी: सेल मैन्युफैकचरिंग इन इंडिया” शीर्षक से जारी एक नई रिपोर्ट में यह बात कही गई है। इस रिपोर्ट में आयातित लिथियम-आयन (ली-आयन) सेल्स पर देश की निर्भरता को कम करने और इसे आत्मनिर्भर ईवी निर्यात केंद्र में बदलने के लिए ईवी मूल्य श्रृंखला की व्यापक योजना के साथ-साथ भारत की ई-मोबिलिटी यात्रा की स्थिति एवं भविष्य का गहन दृष्टिकोण प्रदान किया गया है। करती है। रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत की लिथियम-आयन बैटरी की मांग वर्तमान के 3 गीगावॉट घण्टा से बढ़कर 2026 तक 20 गीगावाट घण्टा और 2030 तक 70 गीगावॉट घण्टा हो जाएगी, वर्तमान में इसकी 70% आवश्यकता पूरी करने के लिए चीन और हांगकांग से आयात किया जाता है। जबकि ईवी सेल ई-मोबिलिटी वैल्यू चेन का सबसे महत्वपूर्ण घटक हैं, भारतीय ईवी उद्योग आयात, सीमित स्थानीय विनिर्माण, कच्चे माल तक सीमित पहुंच और रिफाइनिंग क्षमताओं पर अत्यधिक निर्भरता से ग्रस्त है। अनुसंधान एवं विकास में बड़े निवेश, सहायक सरकारी नीतियां, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश प्रवाह, और भौगोलिक क्षेत्रों में कच्चे माल के संसाधनों के जबरदस्त अधिग्रहण से भारत को लिथियम-आयन बैटरी में आत्मनिर्भरता हासिल करने में मदद मिल सकती है।

आर्थर डी. लिटिल, भारत के मैनेजिंग पार्टनर, बर्निक चित्रन मैत्रा बताते हैं, “भारत में इलेक्ट्रिक मोबिलिटी के विकास में तेजी लाने के लिए, सरकार और उद्योग पारिस्थितिकी तंत्र को स्थापित बैटरी निर्माताओं, ओईएम, एवं स्टार्ट-अप के साथ सहयोग करना होगा, लगातार शोध एवं अनुसंधान में निवेश करना होगा, साझेदारियां करनी होंगी और वैश्विक गठबंधन बनाने होंगे ताकि मजबूत आपूर्ति श्रृंखला का निर्माण किया जा सके। ग्राहकों की मांग के साथ, यह भारत को वैश्विक ईवी पावरहाउस में बदल देगा। हालांकि फेम I और II नीतियों जैसे सरकारी प्रयास और ओईएम में वृद्धि, परंपरागत कंपनियां, आधुनिक स्टार्ट-अप्स द्वारा बैटरी निर्माण की शुरुआत जोर पकड़ रहा है, लेकिन ये बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं हो सकते हैं। मशहूर ब्रांड प्रतिष्ठा हासिल करने के लिए भारतीय कंपनियों के लिए बेहतर गुणवत्ता और पर्यावरण मानकों हेतु प्रयास करना अनिवार्य है, जिससे भारत को सेल्स में आत्मनिर्भर बनने और इसे वैश्विक निर्यात केंद्र के रूप में स्थापित करने में मदद मिलेगी। रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत सरकार को बैटरी के लिए आपूर्ति श्रृंखला को स्थानीय बनाने के लिए कई मोर्चों पर काम करना होगा, जिससे घरेलू निर्माताओं के लिए लिथियम, कोबाल्ट, मैंगनीज और निकल जैसे कच्चे माल की बेहतर उपलब्धता सुनिश्चित हो सके।

एडीएल रिपोर्ट में इस बात पर प्रकाश डाला गया है कि भारतीय बैटरी कंपनियों को उन्नत सेल केमिस्ट्री जैसे सोडियम-आयन, मेटल-एयर और डिजाइन में सहयोगी अनुसंधान एवं विकास में निवेश करना चाहिए जो भारतीय संदर्भ में सुरक्षित, टिकाऊ और किफायती हों और बड़े पैमाने पर जिनका व्यावसायीकरण किया जा सके। वैश्विक साझेदारी, संयुक्त उद्यम और अधिग्रहण से क्षमताएं बढ़ सकती हैं और मजबूत प्रतिभा बढ़त हासिल की जा सकती है। महत्वपूर्ण उद्योग चुनौतियों में से एक लिथियम, निकल, कोबाल्ट और मैंगनीज जैसे प्रमुख कच्चे माल तक भारत की सीमित पहुंच है, जो कि सेल की लागत का 80% से अधिक है, क्योंकि इन सामग्रियों के प्राकृतिक भंडार कुछ ही देशों में हैं। इसके अलावा, भारत में इन सामग्रियों के लिए पर्याप्त शोधन क्षमता का अभाव है। इस प्रकार, लिथियम-आयन बैटरी आपूर्ति श्रृंखला का स्थानीयकरण भारत की आत्मनिर्भर बनने और इसे वैश्विक ईवी निर्माता एवं निर्यातक के रूप में स्थापित करने की महत्वाकांक्षा की कुंजी है।कच्चे माल के प्राकृतिक संसाधनों में समृद्ध देशों में द्विपक्षीय संबंधों और निवेश में सुधार, स्थानीय कंपनियों को प्रोत्साहन, कड़े नियामक प्रतिबंधों में छूट के साथ टिकाऊ घरेलू ग्रेफाइट खनन को बढ़ावा देना, सेल और बैटरी पर आयात शुल्क बढ़ाना, कर सब्सिडी, और पीएलआई/उत्पादन और रीसाइक्लिंग को प्रोत्साहित करना बैटरियों, एसईजेड/लिथियम पार्कों के विकास और अनुकूल विनियमों से सेल निर्माण स्थानीयकरण की गति में तेजी आएगी। भारत स्थायी भविष्य के लिए बैटरी निर्माण और पुनर्चक्रण पारिस्थितिकी तंत्र में महत्वपूर्ण विकास के अवसरों को गति देने के सिरे पर खड़ा है। मजबूत, स्थानीयकृत, ईवी मूल्य श्रृंखला से उत्सर्जन में कमी, कच्चे माल पर बचत, और पारंपरिक आंतरिक दहन इंजन (आईसीई) वाहनों की विनिर्माण से जुड़ी नौकरियों के नुकसान की भरपाई के मामले में काफी प्रोत्साहन मिल सकता है - जिससे यह अधिक हरा-भरा, स्मार्ट बन सकेगा और राष्ट्रीय उत्पादकता में योगदान दे सकेगा।

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