अपने आपे में आने से आनन्द की अनुभूति होती है : गंगा नन्दनी

शब्दवाणी समाचार, मंगलवार 18 अक्टूबर 2022, सम्पादकीय व्हाट्सप्प 8803818844, गाजियाबाद। अखिल भारतीय ध्यान योग संस्थान, गाजियाबाद द्वारा परमार्थ निकेतन,ऋषिकेश में स्वामी चिदानंद सरस्वती जी के सानिध्य में लगा त्रिदिवसीय योग शिविर हर्षोल्लास से संपन्न हुआ। योग मर्मज्ञ योगी नेतराम जी ने ओ३म् की ध्वनि,गायत्री मंत्र तथा योगी प्रवीण आर्य ने ईश भक्ति गीत से सत्र को प्रारम्भ किया। समापन समारोह में पूज्य स्वामी चिदानंद सरस्वती ने अपने उद्बोधन में कहा कि ध्यान तनाव से मुक्ति दे सकता है इसलिए ध्यान के पथ पर आगे बढ़ो।ध्यान जीवन में सरलता,सजगता, सरसता,विनम्रता लाता है क्योंकि यदि भीतर विनम्रता नहीं होगी तो आनंद जीवन का नहीं आएगा। उन्होंने जीवन में बहुत से लोगों को अकड़ में देखा है वह बोले अकड़ से जीवन में मस्ती नहीं आएगी।कुछ लोग सोचते हैं अहंकार से बहुत कुछ प्राप्त किया जा सकता है परंतु अकड़ और पकड़ साथ साथ नहीं चलती। जो व्यक्ति विनम्र होता है अपना अहंकार,खुद को भुलाकर दुसरे की सेवा से प्रसन्न होता है।

विनम्रता से व्यक्ति का जीवन आगे बढ़ता है।संस्कार जीवन में व्यक्ति को पीड़ा से मुक्त करते हैं,इसलिए संस्कार जरूरी है,ध्यान जरूरी है।खुद को भी ध्यान से,ध्यान में देखते हैं तो पता लगता है कि अंदर क्या-क्या है?बाहर वाला तो बाहर रह जाएगा, भीतर वाला साथ जाएगा,दुनियां में भीतर से शांति होती है यदि भीतर भी अशांति हो गई तो समस्या हो जाएगी।भीतर की शांति ध्यान से संभव है।ध्यान से विनम्रता आती है विनम्र व्यक्ति झुक सकता है और अकड़ मुर्दे की पहचान होती है।मुझे क्या करना है?मेरा चुनाव है। मैं क्या चुनता हूं? जो मैं सुनता हूं,बोलता हूं,उसी से मेरा जीवन बन जाता है,जीवन का निर्माण होता है।ईश सृष्टि और जीव सृष्टि। ईश सृष्टि में सब कुछ अपने आप चल रहा है, बिना थके चलता रहता है परमात्मा सब को सुख दे रहा है और यही जीव की यात्रा में जीव सृष्टि दुख दे रही है।परमात्मा की रचना विचित्र है कि वह 8 बिलियन लोगों की सुनता है।वह अपने स्वार्थ से ऊपर उठा हुआ है।जो अपने को स्वार्थ से ऊपर उठा देता है, उसी का ध्यान प्रभु में लगेगा।केवल अपना ध्यान स्वार्थ है।दूसरों का ध्यान,प्रकृति का ध्यान यही ध्यान है।हमारी सोच ही सब कुछ बदलती है इसलिए ध्यान जरूरी है।जो ध्यान लगाता है,उसके भीतर के मल को वह साफ करता है।मन को इधर-उधर के विचारों से बचाएं यही ध्यान है। मन के मालिक आप हैं लेकिन मन आप नहीं। 

यह अस्तित्व का आनंद है अपने लिए दूसरों के लिए कितने जागरूक हैं आप?जो लोग परिवारों में साथ मिलकर परिवार के साथ प्रार्थना करते हैं,साथ साथ भोजन करते हैं,वहां सुख, शांति,समृद्धि की बढ़ोतरी होती है।हमारे भीतर की दुनियां हमारी है, बाहर की दुनियां ईश्वर की। मेरे भीतर की दुनिया हमारे साथ जाएगी।इन्हीं संचित सुकर्म प्रारब्ध के अनुसार हमारा अगला जन्म होगा।अन्यथा बार बार आना पड़ेगा,आवागमन के चक्र को समाप्त करना ही ध्यान है।"तन्मय मना: शिव संकल्पंस्तु" मेरा मन शिव संकल्प वाला हो।मेरी सोच कैसे बनती है? क्या सुनता हूं?कहां जाता हूं? क्या खाता हूं? कब-कब खाता हूं?यही आध्यात्म है।अपनी आत्मा को उन्नति की ओर ले जाना जिससे आपका पतन ना हो। संसार में रहते रहते मोक्ष हो संसार का हित होता रहे राष्ट्र की सेवा में लगे रहें। राष्ट्र का चिंतन होने से प्रत्येक सेवा कार्य  परमार्थ के लिए होगा।लक्ष्य पैसा होगा तो ना सेवा होगी ना परमार्थ होगा।खुद को देखो,ध्यान मुझ में बैठ जाए।आंख बंद करने का नाम ध्यान नहीं खुलने का नाम ध्यान है।भीतर के विष का शमन हो।अपना जीवन प्रभु चरणों में समर्पित हो,जीते जी कुछ ऐसा करें।जगते हुए जागरूक लोग इस जगत को चाहिएं,यही मुक्ति है,मोक्ष हो।

परमार्थ निकेतन की योगाचार्या सुश्री गंगा नन्दनी जी ने शिविरार्थीओं को सूक्ष्म व्यायाम, भास्रिका क्रिया,कपाल शोधन, अर्धमस्तेन्द्रासन,वक्रासान, सूर्य नमस्कार,भ्रामरी एवं उज्जैयी प्राणायाम का अभ्यास कराया और इसके लाभों की चर्चा की और कहा कि स्वयं के साथ जुड़ जाना ही योग है,अपने आपे में आने से आनन्द की अनुभूति होती है।योग करने से बुद्धि विकसित होती है,हास्यासन से खुश रहते हैं,जहां ऑक्सीजन ज्यादा हो वहां प्राणायाम का अभ्यास करने से प्राण शक्ति बढ़ती है,लंग्स, डायाफ्राम मजबूत होते हैं।योग रोगों से बचाता है।भ्रामरी प्राणायाम से कंसन्ट्रेशन  बढ़ता है।योगश्चित्तवृत्तिनिरोध:पतंजलि के अनुसार चित्त की वृत्तियों को चंचल होने से रोकना (चित्तवृत्तिनिरोधः) ही योग है। अर्थात् मन को इधर-उधर भटकने न देना,केवल एक ही वस्तु में स्थिर रखना ही योग है। संस्थान के अध्यक्ष श्री केके अरोड़ा ने साधकों से कहा कि हम स्वयं को पहचानें,सब कुछ यहीं छोड़ कर जाएंगे काया ओर जीव का जोड़ ही योग है इसलिये काया को स्वस्थ्य रखें,हंसते मुस्कुराते रहें। संस्थान की ओर से परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष एवं संस्थापक सदस्य पूज्य स्वामी चिदानंद सरस्वती जी एवं डा भगवती सरस्वती जी,योगाचार्या नंदनी गंगा जी एवं परमार्थ निकेतन के सभी कार्यकर्ताओं के सहयोग के लिए धन्यवाद ज्ञापित किया गया। शांति पाठ से कार्यक्रम सम्पन्न हुया,प्रसाद ग्रहण कर लोग घरों को लोटे।

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