जयपुर इंटरनेशनल फिल्म फैस्टिवल का चौथा दिन

शब्दवाणी समाचार, मंगलवार 10 जनवरी 2023, सम्पादकीय व्हाट्सप्प 8803818844, जयपुर। पन्द्रहवें जयपुर इंटरनेशनल फिल्म फैस्टिवल का चौथा दिन फिल्म अभिनेता इरफान की मखमली यादों से सराबोर रहा। इसी दिन समारोह के तहत ग्लोबल फिल्म टूरिज़्म समिट आयोजित की गई, फिल्म सिटी की आवश्यकता पर चर्चाओं के दौर चले और प्लेबैक सिंगर रवीन्द्र उपाध्याय के दिलकश गीतों का वहां मौजूद फिल्म प्रेमियों ने जमकर लुत्फ उठाया। इसके अलावा जयपुर फिल्म फैस्टिवल के सहयोग से ईरानी संगीत का विशेष कार्यक्रम भी फिल्म प्रेमियों के आकर्षण का केन्द्र रहा। चौथे दिन मानसिक योग पर आधारित छह ऐसी फिल्मों की स्क्रीनिंग की गई जिन्हें देखकर लोगों को सुकून की अनुभूति हुई। जिफ के फाउन्डर डायरेक्टर हनु रोज ने बताया कि ऐसा दुनिया में पहली बार हुआ है जब फिल्मों के जरिए मानसिक योग की अनुभूति करवाई गई हो।

समारोह के तहत तीन दिवसीय जयपुर फिल्म मार्केट के तीसरे दिन की शुरूआत फिल्म समीक्षक अजय ब्रह्मात्मज़ की इरफान के साथ अनुभवों पर लिखी किताब ‘और कुछ पन्ने अधूरे रह गए’ के विमोचन और उस पर हुई चर्चा से हुई। इस चर्चा को फिल्म स्क्रिप्ट राइटर रामकुमार सिंह ने मॉर्ड्रेट करते हुए इरफान के बेटे अभिनेता बाबिल खान, इरफान के गुरू डॉ. रवि चतुर्वेदी तथा अजय ब्रह्मात्मज से विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की। चर्चा के दौरान बाबिल खान ने कहा कि इरफान पिता कम दोस्त ज्यादा थे। जो लोग कहते हैं कि वो अत्यन्त गंभीर थे पर मेरी नज़र में वो बेहद खुशमिजाज और ज़िंदादिल इनसान थे। हम लोग जब साथ होते थे तो खूब हंसते थे। किसी कार्यक्रम में पापा को कोई बात अच्छी नहीं लगती तो वो मुझे साइड में लेकर मजाक करने लग जाया करते थे। मुझे उनके साथ जयपुर आना सबसे अच्छा लगता था क्योकि वो जब मुझे जयपुर अपने साथ लाते थे तब मैं उन्हें अपने सबसे करीब पाता था क्योंकि मुंबई मे ंतो काम की व्यवस्तताओं के चलते हमारे बीच दूरी ही रहती थी। पापा को पतंगबाज़ी का कितना शौक था इस बात का अंदाज इसी बात से लगाया जा सकता है कि मैं उनकी पतंग फाड़े देता था लेकिन वो फटी पतंग को ही उड़ा देते थे।

पापा मुझे अभिनेता बनाना नहीं चाहते थे लेकिन उन्हें यह भी पता था कि मैं अभिनेता ही बनूंगा। पापा मुझे सिखा गए  थे कि दबाव से इनसान बनता है, इसलिए ज़िंदगी में आगे बढ़ने के लिए दबाव बेहद ज़रूरी है। अजय ब्रह्मात्ज़ ने कहा कि इस पुस्तक को छपे दो साल से ज्यादा समय हो गया है लेकिन मैनें इसे कभी सार्वजनिक नहीं किया, आज पहली मर्तबार इसकी प्रतियों को आपके समक्ष लेकर आया हूं। दो साल पहले इसे ई-बुक के रूप में अमेजन पर अपलोड किया गया था तब दस दिन के भीतर ही इसकी 1 हजार प्रतियां बिक गईं। अजय ब्रह्मात्ज ने कहा कि इस पुस्तक में इरफान से जुड़े 36 हस्तियों के संस्मरण हैं जिन्होंने अपने अपने हिस्से का इरफान इसमें शेयर किया है। इसमें इरफान की भाषा है वो कैसे सोचते थे कैसे बोलते थे। जो इसे पढ़ेगा अमीर होकर निकलेगा। अजय ने कहा कि एक्टर क्या होता है ये इरफान ने अच्छी तरह समझ लिया था। वो कहते थे मुझे खुद में कुछ भी बदलाव नहीं करना है अपनी ही आवाज़ रखनी है, अपना ही चेहरा रखना है, मैं जैसा हूं रहूंगा अपने मिजाज के साथ एक्ट करूंगा।

बाबिल खान ने कहा  उनका इनर वर्ल्ड बड़ा ही स्ट्रांग था वो अपनी आंखों अथवा शब्दों से अभिनय करते थे, अभिनय उनके भीतर से निकलता था। इरफान के गुरू डॉ. रवि चतुर्वेदी ने कहा कि इरफान उनके उन चुनिंदा शिष्यों में से थे जिन्हें मैनें सबसे ज्यादा डांट पिलाई। वो नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा से निकलने के बाद तक मुझसे डांट खाता था। मुंबई में गोविन्द निहलानी सहित कई बड़े फिल्म निर्माता निर्देशकों से मेरे गहरे संबंध थे और इरफान इस बात को अच्छी तरह जानते थे। उन्होंने कई बार मुझसे खुद को प्रोड्यूस करने के लिए कहा लेकिन मैं उन्हें साफ मना कर देता था। मैं कहता था मेरे कहने से तुम्हारी प्रतिभा का सही आंकलन नहीं हो पाएगा। मैनें उन्हें उनके एक बेहतरीन अभिनय की वीडियो कैसेट उन्हें दी और कहा जिससे भी मिलो कोशिश करके उसे ये अवश्य दिखा देना, यही तुम्हें काम दिलाएगी और हुआ भी यही। बातचीत के बाद रामकुमार सिंह, अजय ब्रह्मात्ज, बाबिल खान और डॉ. रवि चतुर्वेदी ने ‘और कुछ पन्ने अधूर रहे गए....इरफान’ पुस्तक का विमोचन किया। इसके बाद समारोह स्थल पर जिफ की ओर से ईरानी संगीत का प्रमोशन किया गया। इस मौके पर ईरानी की अमेरिका में रहकर काम रहीं फिल्मकार मरियम पीरबंद का ईरानी में हिजाब के खिलाफ संघर्ष कर रही महिलाओं की मनोदशा पर आधारित तैयार संगीत को बजाया गया। उल्लेखनीय है कि जिफ फिल्मों की स्क्रीनिंग के साथ साथ फिल्मों और लीक से हटकर संगीत के प्रमोशन के लिए भी काम कर रहा है।

समारोह के दौरान जाने-माने बॉलीवुड पार्श्व गायक रवीन्द्र उपाध्याय की म्यूजिकल इवनिंग भी आकर्षण का केन्द्र रही। रवीन्द्र ने जयपुर इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में आने वाले देसी -विदेशी मेहमानों को ‘पधारो म्हारे देस’ सुना कर दिल जीत लिया। आवाज़ का जादू बिखेरते हुए रविंद्र उपाध्याय ने स्वर साम्राज्ञी लता मंगेशकर को याद करते हुए ‘सोलाह बरस की बाली उमर का ेसलाम’ को अपने ही अंदाज में सुनाया। येसुदास के गाए चर्चित गीत ‘बड़े अच्छे लगते हैं’ और जगजीत सिंह की ग़ज़ल ‘बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी’ में सभी श्रोताओं ने रविंद्र उपाध्याय के साथ आवाज से आवाज मिला दी। जिफ के फाउन्डर डायरेक्टर हनुरोज ने रविंद्र उपाध्याय और उनके साथी कलाकारों संजय माथुर, शान और वसीम का स्वागत किया। प्रोग्राम के अंत में हनुरोज ने सभी श्रोताओं को बताया कि कैसे लैपटॉप पर चलती उंगलियों ने ये जिफ का संसार बनाया, लोग जुड़ते गए और कारवां बनता गया। उन्होंने बताया कि मैं कछुए की चाल से चला पर अपनी मंजिल हासिल कर ही ली पर अभी सफ़र बाकि हैं।

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