फोर्टिस शालीमार ने स्पाइनल टीबी और लकवाग्रस्त गर्भवती से करवाया स्वस्थ शिशु को जन्म

  7 महीने तक लकवाग्रस्त करने के बाद 28 साल वर्षीय मरीज ने चलना-फिरना शुरू किया  

शब्दवाणी समाचार, वीरवार 22 फरवरी 2024, सम्पादकीय व्हाट्सप्प 8803818844, नई दिल्ली। फोर्टिस शालीमार बाग में 28 वर्षीय एक महिला मरीज का सफल उपचार कर डॉक्टरों ने शानदार मेडिकल उपलब्धि दर्ज करायी है। यह मरीज स्पाइनल ट्यूबरक्लॉसिस और 7 महीने से पैरालिसिस से पीड़ित थी। यह अपने आप में काफी चुनौतीपूर्ण और दुर्लभ मामला था। मरीज गर्भवती थी और चार महीनों से पीठ दर्द की समस्या से परेशान थीं। शुरू में उन्हें लगा कि यह दर्द गर्भधारण के कारण हो सकता है, और इसी वजह से उन्होंने इसकी तरफ ज्यादा ध्यान नहीं दिया। लेकिन गर्भधारण के छठे महीने तक भी उनकी तकलीफ कम नहीं हुई और इस बीच उनके दोनों पैरों में कमजोरी भी महसूस होने लगी तथा अगले 20 दिनों में दोनों पैर पूरी तरह से लकवाग्रस्त हो गए और उन्होंने बिस्तर पकड़ लिया। मरीज की हालत इतनी बिगड़ गई कि वे पेशाब भी नहीं कर पा रही थी, तब उन्हें कैथेटर लगाया गया। इतना सब होने पर मरीज को इलाज के लिए फोर्टिस शालीमार बाग लाया गया जहां उनकी एमआरआई जांच के बाद स्पाइनल ट्यूबरक्लॉसिस की पुष्टि हुई। अगले कुछ महीने मरीज को अस्पताल के डॉक्टरों की मल्टी-डिसीप्लीनरी टीम की देखरेख में रखा गया जिसका नेतृत्व डॉ सोनल गुप्ता, डायरेक्टर एवं एचओडी न्यूरोसर्जरी, फोर्टिस हॉस्पीटल शालीमार बाग ने किया। इलाज के बाद मरीज न सिर्फ खुद पूरी तरह स्वस्थ हो गईं थीं बल्कि उन्होंने एक स्वस्थ शिशु को भी जन्म दिया। अस्पताल में मरीज को लाए जाने पर उनका एमआरआई किया गया जिससे उनकी रीढ़ में तपेदिक (स्पाइनल ट्यूबरक्लॉसिस) होने का पता चला जिसके कारण स्पाइनल कॉर्ड में कम्प्रेशन था। इस दबाव को कम करने के लिए तत्काल सर्जरी जरूरी थी जिससे उनकी रीढ़ को स्थिर बनाने में मदद मिली। लेकिन मरीज की प्रेगनेंसी के चलते यह सर्जरी काफी जटिल थी और डॉक्टरों ने उन्हें इस तरह से लेटाकर सर्जरी की जिससे उनके गर्भ/भ्रूण पर कोई दबाव न पड़े। डॉक्टर उनके मामले में पारंपिरक स्पाइनल फिक्सेशन का इस्तेमाल नहीं कर सकते थे क्योंकि प्रेगनेंसी की वजह से एक्स-रे नहीं किया जा सकता था जो कि रीढ़ में स्क्रू फिट करने (इंटरवर्टिबल टिटेनियम केज) के लिए जरूरी था। तब सर्जन्स से एक अस्थायी वायर फिक्सेशन की मदद ली और एनेस्थीसिया भी सावधानीपूर्वक दिया गया ताकि मां और शिशु को कोई नुकसान न पहुंचे। 

इतनी गंभीर हालत होने के बावजूद मरीज काफी आशावान थीं और सी-सेक्शन के जरिए प्रसव होने तथा एक स्वस्थ शिशु के जन्म लेने तक वह बिस्तर पर ही रहीं। प्रसव के 15 दिनों के बाद उनकी एमआरआई जांच से पता चला कि रीढ़ में सूजन है, और साथ ही रीढ़ के अस्थिर होकर कॉलेप्स् करने की वजह से कम्प्रेशन भी है। इस समस्या को दूर करने के लिए एक और सर्जरी की गई और इस बार ट्यूबरक्लासिस से प्रभावित टिश्यू को हटाने तथा रीढ़ को स्थिरता देने के लिए उनके फेफडे के साइड से यह सर्जरी की गई, जिसमें वर्टिब्रल गैप को भरने के लिए एक केज और स्क्रू लगाए गए। सर्जरी के तीन माह बाद भी जब मरीज के पैर में कोई हरकत नहीं हुई तो एक और एमआरआई जांच की गई जिससे पता चला कि उनकी रीढ़ में सूजन है। इतनी मुसीबतों के बावजूद मरीज और उनके पति ने हिम्मत नहीं खोयी और लगातार इलाज को लेकर आशावान बने रहे। उन्होंने नियमित फिजियोथेरेपी के साथ-साथ ट्यूबरक्लॉसिस का उपचार जारी रखा। उनकी यह दृढ़ता और संकल्पशक्ति रंग लायी तथा धीरे-धीरे मरीज की हालत में सुधार आने लगा। ट्यूबरक्लॉसिस का इलाज शुरू होने के 9 महीनों के बाद उन्होंने दोबारा चलना शुरू कर दिया है और 18 महीने तक लंबे इलाज के बाद उनकी चलने-फिरने की पूरी क्षमता लौट आयी है। इस मामले का ब्योरा देते हुए, डॉ सोनल गुप्ता, डायरेक्टर एवं एचओडी न्यूरोसर्जरी, फोर्टिस हॉस्पीटल शालीमार बाग ने बताया, “यह मेडिकल इतिहास में अपनी तरह का बेहद दुर्लभ मामला था जिसमें लकवाग्रस्त मरीज को 7 महीने तक इलाज पर रखने के बावजूद उनके पैरों में कोई हरकत नहीं हुई थी। प्रेगनेंसी में स्पाइनल ट्यूबरक्लॉसिस भी काफी दुर्लभ मामला है लेकिन लगभग 7 महीने तक पूरी तरह लकवाग्रस्त रहने के बाद अब मरीज ने आखिरकार पूरी मोबिलिटी हासिल कर ली है, जो कि न सिर्फ दुर्लभ है बल्कि किसी चमत्कार से कम नहीं है। 

डॉ सोनल ने बताया गर्भस्थ शिशु को बचाना सबसे बड़ी चुनौती था क्योंकि मरीज की रीढ़ पर दबाव बढ़ने की वजह से उनके गर्भ पर भी दबाव था जिसके चलते उनके पेट में भयंकर दर्द था। इसके अलावा, उनकी सर्जरी भी एक बार में पूरी नहीं की जा सकती थी क्योंकि भ्रूण को रेडिएशन से रिस्क था। लेकिन मरीज समेत उनके परिवार ने काफी सहयोगी रवैया अपनाए रखा और अस्पताल ने भी उचित मेडिकल इंटरवेंशन को जारी रखा जिसके परिणामस्वरूप मरीज अब ट्यूबरक्लॉसिस से पूरी तरह मुक्त हैं और नॉर्मल जिंदगी जी रही हैं। शीघ्र निदान और तत्काल मेडिकल सहायता मिलने से स्पाइनल ट्यूबरक्लॉसिस का इलाज बेहतर तरीके से हो सका। यदि मरीज को समय पर उपचार नहीं मिलता तो बहुत मुमकिन है कि वे आजीवन बिस्तर तक सिमटी रहती और व्हील-चेयर का सहारा लेने को मजबूर हो जातीं।

दीपक नारंग, फैसिलटी डायरेक्टर, फोर्टिस हॉस्पीटल शालीमार बाग ने कहा यह मेडिकल एक्सीलेंस का ऐसा मामला है जिसने मरीज को ऐसे हालात में राहत दिलायी जिसमें आमतौर से रिकवरी मुमकिन नहीं होती। इस मामले में इलाज के लिए मल्टी-डिसीप्लीनरी टीम ने मिलकर काफी सोच-समझ से काम लिया और मरीज की नाजुक हालत देखते हुए उपचार किया। तमाम चुनौतियों के बावजूद मरीज की स्थिति का सही मूल्यांकन किया गया और डॉक्टरों की मल्टी-डिसीप्लीनरी टीम ने मरीज का सफल उपचार किया। इस टीम में डॉ सोनल गुप्ता, डायरेक्टर एवं एचओडी न्यूरोसर्जरी के अलावा डॉ सुनीता वर्मा, डायरेक्टर आब्सटैट्रिक्स एवं गाइनीकोलॉजी, डॉ प्रदीप कुमार जैन, प्रिंसीपल डायरेक्टर एवं एचओडी – एलएपी जीआई, जीआई ओंको, बेरियाट्रिक एंड एमआईएस सर्जरी तथा डॉ उमेश देशमुख, डायरेक्टर एवं एचओडी एनेस्थीसियोलॉजी, फोर्टिस हॉस्पीटल शालीमार बाग शामिल थे जिन्होंने न सिर्फ मरीज का जीवन बचाया बल्कि उनके सुरक्षित प्रसव को भी मुमकिन बनाया। इस प्रकार के चुनौतीपूर्ण मामलों से निपटने के लिए फोर्टिस हॉस्पीटल शालीमार बाग के पास पर्याप्त क्लीनिकल विशेषज्ञता है और हम मरीजों का जीवन बचाने तथा उनके लिए बेहतर परिणाम हासिल करने की दिशा में लगातार प्रयासरत हैं।

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